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Mohini Ekadashi on 15 May 2019 (Wednesday)

यह व्रत भगवान गोविन्द को सर्मित है, और उनकी कृपा कटाक्ष प्राप्त करने हेतु इसे किया जाता है। जो सब प्रकार के सुख वैभव देने वाला है।

पुण्यदायक है मोहनी एकादशी व्रत
मोहनी एकादशी का व्रत वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी को वैष्णव व स्मार्त के भेद से मनाई जाएगी। जीवन यात्रा में व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह के वषीभूत होकर नाना प्रकार के जाने अंजाने में पाप करता रहता है। वैदिक धर्म गं्रथांे व सत्यसनातन धर्म में ऐसे कर्म जिनसे अनाचार व पाप उत्पन्न होते हैं वह पाप पूर्ण हैं। इन कर्म बंधनों मे बंध व्यक्ति जन्म जन्मातरों तक दुःखों को भोगता रहता है। अर्थात् प्रत्येक पल कार्य की क्रिया व प्रतिक्रिया उसके दिल, दिमाग को प्रभावित करती है। जहां पुण्य व षुभ कार्मो के द्वारा   उसका चेहरा खिल उठता है और समृद्धि या सुख के रास्ते खुलते हैं। वहीं अशुभ व पाप कर्मो के द्वारा उसका चेहरा झुलस जाता है तथा जन्म जन्मातरों तक उस दुःख व पाप कर्म को भोगने के लिए भटकता रहता है। ऐसे में उसका चेहरा पहचान में नहीं आता उसे अच्छे बुरे का ज्ञान नहीं रहता जीवन दुःख दारिद्रता के थपेड़ों से लहूलुहान हो जाता है। पाप व नीच कर्म करने वाले को भयानक यम यातनाएं झेलनी पड़ती है, इन दुःख पीड़ाओं व नाना प्रकार की योनियों से मुक्ति के अनेक साधन सर्वसाधण व्यक्ति के लिए वेद पुराणों में मिलते हैं। जिसमें एकादषी का व्रत बहुत ही महत्वपूर्ण है। इस व्रत में श्रद्धा विष्वास पूर्ण भगवान विष्णु लक्ष्मी नारायण की पूजा अर्चना षोड़षोपचार विधि से की जाती है।
दुःखों से मुक्ति पाने के सरल साधनों को एक बार अर्जनु ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा कि हे! भगवान केषव आपके चरणों मे मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है। प्रभु कृपा करके चैत्र मास की षुक्ल पक्ष की एकादशी को बतलाइए। इसका क्या नाम है और इस व्रत को पहले किसने किया।

भगवान बोले हे पाण्डुनन्दन! प्राचाीन काल में भद्रावती की नगरी में द्युतिमान नाम का राजा राज्य करता था। उसी नगरी में एक वैष्य रहता था, जो धन-धान्य से पूर्ण था। उसने अनेक धार्मिक कार्य किए आम, जामुन, पीपल, नीम आदि के कई सुखदायी वृक्ष लगाए कुंए तथा वावड़ी, तालाब आदि भी खुदवाये वह पुत्र पौत्र आदि के सुखों से विभूषित था उसके पुत्रों में सबसे बड़ा पुत्र नास्तिक था वह माता-पिता गुरू आदि कीे बात को नहीं मानता था बुरे कार्य चोरी बुरे व्यसन मद्यपान और कुसंग में अधिकांश धन व्यय करता था। इस प्रकार जब उसका सारा धन समाप्त हो गया तो वह चोरी करने  लगा वैष्य को पुत्र समझ एकदा राजा ने उसे छोड़ दिया। किन्तु उसकी चोरी की वृत्ति नहीं छूटी इस अपराध में राजा ने उसे कारगार में सजा देने के बाद नगर छोड़ने का आदेष दिया। जिससे वह क्षुधा से व्याकुल होकर वन-वन भटकने लगा अपनी क्षुधा की तृप्ति की हेतु वह पशुओं व चिड़ियों को मारने लगा यानी एक हिंसक बहिया होकर नाना प्रकार के कष्टों से आक्रान्त हुआ जंगल में भटक रहा था। संयोग से वैशाख मास (जो अत्यंत पुण्य मास है) में तपोधन तेजवस्वी ऋषि कौटिन्य गंगा स्नान करके आ रहे थे और यह पापी रूपी बहेलिया उनके निकट से गुजरा तो ऋषि के तेज से इसकी बुद्धि निर्मल हुई और हाथ जोड़ कर विनय पूर्वक कहने लगा हे मुनि! मैंने अपने जीवन मेंा जीव हिंसा, माता-पिता, गुरू बहुत अवज्ञा की हैं, मानव तन पाकर भी इस जीवन को पाप कर्मों से मुक्त नहीं कर सका इसलिए कोई ऐसा सरल उपाय बतााइए जिसमें कोई धन भी न लगे और पुण्य में वृद्धि हो, इस पर तपोधन मुनि कौटिन्य ने उसके विनय पर उसे वैशाख मास की षुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने को कहा इस एकादशी को मोहिनी एकादशी कहते हैं क्योंकि लोभादि मोह हैं, जो पाप का मूल हैं इस एकादशी के व्रत करने से पाप छूट जाते हैं तथा पुण्य कर्मो में वृद्धि होती है।  

व्रती भगवान श्री हरि के धाम का अधिकारी हो जाता है। 

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