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Narasimha Jayanti on 17 May 2019 (Friday)

श्री नरसिंह जयंती का महत्व
सत्य सनातन हिन्दू धर्म ग्रंथों में चर्तुयुगी व्यवस्था का एक मात्र ऐसा अद्भुत वर्णन है जो विष्व में कहीं नहीं मिलता जिसमें चारों युगों मे अलग-अलग धर्माचरण और व्यवस्थाएं व्यक्ति व समाज कल्याण हेतु निर्धारित की गई हैैं। किन्तु जब इस धरा में धर्म का पतन हो जाता है नाना प्रकार के अत्याचार, अपराध, आर्थिक, षारीरिक, षोषण बढ़ते है धर्म व मर्यादाओं की हानि होती है तो श्री भगवान विष्णु भक्त, सज्जन, ब्राह्मणों और धर्म रक्षा हेतु अवतारों को धारण करते है।
जिसको श्रीराम चरित्र मानस के रचइता गोस्वामी तुलसीदास इस प्रकार लिखते हैः-
जब जब होई धर्म के हानि। बाढ़हि असुर महाअभिमानी।
तब-तब प्रभु धर मनुज षरीरा। हरहि कृपा निधि सज्जन पीड़ा।।

कलयुग चतुर्युगी क्रम में अंतिम युग है, इस कलियुग के समान और कोई दूसरा युग नहीं ऐसा वर्णन मिलता है। इस युग में भगवान की निकटता व कृपा पाने के लिए हरि नाम का जाप है, जो व्यक्ति इसे निष्ठा व श्रद्धा से करता है उसे निष्चित ही प्रभु की कृपा मिलती है। कलियुग में व्यक्ति जैसा करता है वैसा ही फल उसे कुछ ही समय में प्रतीत होने लगता है। इस युग मे धर्म कर्मो और सज्जनों का बार-बार अपमान होता उन्हें कई प्रकार की प्रताड़नाएं भोगनी पड़ती है। किन्तु इसके विपरीत अधर्मी, पापी, लोभी, व्यभिचारियों का बोलबाला रहता है और वे सज्जनों को बार-बार प्रताड़ित करते हैं। ऐसे जब पाप कर्मो से धरा अकुलाती है तो भक्तों तथा साधु सज्जनों की रक्षा व उनके सम्मान और भक्ति में वृद्धि करने के कारण श्री हरि विष्णु का अवतार होता है। प्रत्येक युग में धर्मवती धरा की रक्षा हेतु भगवान ने अवतारों को धारण किया जैसे- सतयुग में वामन, त्रेतायुग में श्रीराम, द्वापर में श्रीकृष्ण तथा कलियुग में श्री कल्कि भगवान का मुख्य रूप से अवतार का वर्णन वेद पुराणों मे मिलता है।

इसी प्रकार भगवान नर सिंह का अवतार भी प्रमुख है भक्त प्रह्लाद और धर्म की रक्षा के लिए यह अवतार श्री हरि ने धारण किया। जिसमें उनका आधा रूप नर यानी मनुष्य का और आधा अवतार सिंह का है इस कारण उनके इस अवतार को नरसिंह अवतार कहा जाता है।

इस अवतार के विषय में पुराणों मे ऐसी कथा प्रचलित है। कि हिरयाकष्यप नाम का राजा था जो धर्म व भगवान से घृणा करता था। क्योंकि उसने पूर्वकाल मे तपस्या करके भगवान से ऐसा वरदान मांगा कि मंै न तो दिन मे मरूँ न तो रात में न आकाष में न पाताल, में न किसी मनुष्य से न किसी पषु से न ही घर के भीतर न ही घर के बाहर इस प्रकार वरदान के अभिमान से अभिमानित वह नाना प्रकार के अधर्म और पापाचार करने लगा जिसके कारण प्रभु ने नर सिंह अवतार धारण किया। किन्तु दैव योग से उसके यहां उसका पुत्र धर्म का अनुसरण करने वाला और प्रभु भक्त था। उसकी इस भक्ति से वह उसे नाना प्रकार के दण्ड देता रहा किन्तु जब उसने अपनी भक्ति नहीं छोड़ी और श्रद्धापूर्ण श्री हरि का स्मरण व ध्यान करता रहा। इसी प्रकार एक दिन उसके पिता हिरण्याकष्यप ने उसे तपते हुए खम्भे में बांध कर मारने लगा और कहने लगा बता तेरा प्रभु राम कहां है? अगर वह है तो उसे बुला ऐसे मे प्रह्लाद ने श्री हरि का ज्यों ही स्मरण किया त्यों ही प्रभु उस खम्भ को फाड़कर प्रकट हो गये। और उसके आष्चर्य जनक रूप से अपने नखों से विदीर्ण कर दिया उस भयानक रूप से बड़े राक्षस, दानव आदि भयभीत हो उठे किन्तु देव समूहों ने पुष्प वर्षा कर प्रभु का स्मरण किया इसी प्रकार श्रद्धा भक्ति पूर्ण सम्पूर्ण धरा में प्रभु का वंदन किया गया और इस उपलक्ष्य में भगवान नरसिंह की जयंती मनाई जाती है। 

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