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भाई बहनों का त्यौहार रक्षा बंधन on 15 Aug 2019 (Thursday)

रक्षा बंधन को त्यौहार हिदुंओं के प्रमुख त्यौहारों में से एक है। इस दिन बाजारों की रौनक देखते ही बनती है। यह त्यौहार बहुत ही खुशी का पल होता हैं क्योंकि भाई बहन अपने जीवन में कितने ही व्यस्त क्यूँ ना हों, इस शुभ दिन अपने भाई-बहन से मिलने का समय निकाल ही लेते है।

कब मनाते है रक्षा बंधन –

यह त्यौहार हिन्दू कैलेन्ड के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिया तिथि को मनाया जाता है। राखी भाई और बहन के प्रेम का प्रतीक का बंधन है। रक्षा बंधन को राखी का त्यौहार भी कहा जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर ऱाखी बांधती है और भाई उनसे आशीर्वाद लेते हैं इस वचन के साथ की वे उनकी सदैव रक्षा करेंगें।

रक्षा बंधन का धार्मिक महत्व:

केवल भाई बहन ही एक दूसरे को राखी नहीं बांधते इस शुभ दिन बल्कि पुरोहित भी अपने यजमान को राखी बांधते हैं। इसके अलावा आजकल लोग प्रकृति का महत्तव समझते हुये वृक्षों को भी राखी बांधते है ताकि मनुष्य और प्रकृति दोनों एक साथ चलती रहे।

कैसे मनाते है रक्षा बंधन का पर्व :

  • रक्षा बंधन के दिन सुबह भाई-बहन सबसे स्नानादि करने के बाद भगवान का आशीर्वाद लेते है।
  • इसके उपरांतं पूजा की थाली सजाई जाती है जिसमें रोली, अक्षत, कुमकुम एवं दीप आदि रखी जाती है।
  • इसके अलावा थाली में बहन द्वारा खरीदी गई राखियां भी सजाई जाती है।
  • राखी की पूजा तिलक के साथ की जाती है, बहनें भाईयों के माथे पर कुमकुम, रोली एवं अक्षत के मिलाकर तिलक लगाती हैं।
  • राखी के दिन बहन भाई की दायीं कलाई (सीधे हाथ) पर रेशम की डोरी से बनी राखी बांधी जाती हैं।
  • इसके बाद मिठाई से मुंह मीठा कराया जाता है। वहीं आजकल बाजार में चाकलेट से बनी मिठाइयां काफी प्रचलन में हैं।
  • राखी बंधवाने के बाद भाई अपनी बहनों को उनकी रक्षा का वचन देते हैं जोकि जीवन पर्यंत निभाया जाता है।
  • रक्षा बंधन का पर इस मंत्र का जाप करने का काफी अच्छा माना जाता है
      • येन बद्धो बलिः राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
      • तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।

रक्षा बंधन की कथा:

ऐसा कहा जाता है सबसे पहले इन्द्र देवता जी की पत्नी देवी सची ने देवराज इन्द्र को असुरों पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से मंत्र-जाप कर शुद्ध किया गया रक्षा सूत्र बंधा था। और इस सूत्र की शक्ति के कारण देवराज युद्ध में विजयी होकर लौटे।

इसके अलावा एक और कथा है कि शिशुपाल के वध के समय भगवान कृष्ण जी की उंगली कट गयी थी तब द्रौपदी जी ने अपनी साड़ी का हिस्सा फाड़कर कृष्ण जी की उंगली पर बांधा। उस समय सावन पूर्णिमा की तिथि थी और भगवान श्री कृष्ण जी ने द्रौपदी जी को जीवन पर्यंत रक्षा का वचन दिया। और इसिलिये द्रौपदी के चिरहरण के समय श्री कृष्ण जी ने उनकी मदद की थी।

इसके अलावा एक और कहानी काफी प्रचलित है कि जब राजपूत रानी कर्मावती को अपने राज्य की रक्षा करनी की चिंता सता रही थी तो उन्होनें मुगल शासक हुमायूं को राखी भेज उनकी सहायता के लिये आग्रह किया था।