Banner 1
Banner 2

बहुला चतुर्थी : विधि-विधान और कथा on 19 Aug 2019 (Monday)

भारत की इस तपोभूमि में नाना प्रकार के व्रत त्यौहारों का आगमन ऋतु चक्र के अनुसार होता है। यहाँ व्रत त्यौहारों के माध्यम से कभी अपने ईष्ट देव को मनाने तथा कभी प्रकृति के संरक्षण हेतु, तो कभी जीव जंतुओं के संरक्षण हेतु कोई न कोई त्यौहार व व्रत मनाएं जाने की परम्परा युगों से चली आ रही है। जीवन को संवारने हेतु यज्ञ, धर्म, कर्म, व्रत, दान, उपवास, अनुष्ठान, सत्य निष्ठा के साथ सदैव किए जाते रहेे हैं। जो लौकिक और परलौकिक जीवन में छाए घने तिमिर को सूर्य के प्रकाश की भांति हटा गतिषीलता प्रदान कर उसे सुखी व समृद्ध बनाते हैं। बहुला चतुर्थी का व्रत विधि-विधान से करने से मनोरथ सिद्ध होते हैं।

इस व्रत में श्रीगणेश और गौ पूजन का विधान है। इस व्रत को पुत्रवती स्त्रियां पुत्रों की रक्षा के लिए करती हैं। इस व्रत के प्रभाव से संतान की रक्षा व संतान की प्राप्ति होती है। व्रती स्त्रियों को स्नानादि क्रियाओं से निवृत्त होकर श्री गणेश की पूजा षड़षोपचार विधि से करनी चाहिए। 
 
बहुला चतुर्थी व्रत का विधि-विधान:
व्रत रखकर सायंकाल मे श्रीगणेश का पूजन, अर्चन करें और चन्द्रोदय होने पर अघ्र्य देकर श्रीगणेश की वंदना करें, श्रीगणपति महाराज को मोदक प्रिय कहा जाता है। इसलिए उन्हें लड्डुओं का नैवेद्य अर्पित करें। जिससे मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और व्रती स्त्री को पुत्र, धन, सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस व्रत में गौ पूजा श्रद्धा विष्वास से करते हुए उसके दूध, घी आदि पदार्थों को व्रत के समय नहीं खाना चाहिए तथा बहुला चैथ के दिन गाय का सम्पूर्ण दूध उसके बछड़े के निमित्त छोड़ना चाहिए। गाय का दूध, दूही, घी, मक्खन, जहाँ शरीर को शक्ति दे उसे निरोग बनाते हैं, वहीं गौ मूत्र, और गोबर भी पंच गब्य के रूप में कैंसर जैसी असाध्य बीमारियों को ठीक करता है। जैसे- कहा जाता है- पय समान औषधी नहीं, जो पय में पय मिला न होय। अर्थात् गो के दूध के समान कोई औषधी (दवा) नहीं किन्तु उसमें कोई मिलावट न हो।
 
गाय का दूध बच्चे के लिए मां के दूध के समान उपयोगी, लाभकारी व निरोगी तथा शक्ति वर्धक है गाय के दूध से बहुत ही तेजी से शरीर का विकास होता है यह कई षोधों द्वारा सिद्ध हो चुका है। इसलिए हमारे यहां परम्परागत रूप से गाय माता के समान पूज्य और वंदनीय है। बहुला चैथ के दिन संध्या के समय गाय पूजा का विधान है, पूजा के बाद इस व्रत की कथा सुननी चाहिए। 
 
बहुला चतुर्थी की कथा:
इस व्रत के विषय में कथा है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण वन में सिंह का रूप धारण कर घोर गर्जना करते हुए कामुधेनु के अंष से उत्पन्न (बहुला) गाय की सत्यता की परीक्षा लेने हेतु खाने के लिए बढ़े। किन्तु उस बहुला गाय ने सिंह रूपधारी भगवान श्रीकृष्ण भगवान से कहा हे! वनराज मुझेे अभी जाने दो क्योंकि मेरा बछड़ा सारे दिन से हंुकार भरता हुआ मेरा इंतजार कर रहा है मंै उसे दूध पिलाकर वापस आ जाऊंगी तब आप मुझे खा लेना। गाय के ऐसे वचन सुन सिंह ने उसे जाने दिया और जब वह अपने निष्चित वायदे के अनुसार वापस सिंह के पास आ गयी तो भगवान ने अपने रूप को प्रकट कर उसकी सत्यता से प्रसन्न हो उसे पुत्र, धन, धान्य आदि सुखों से सम्पन्न रहने का वरदान दिया और वचन दिया जो भी स्त्री बहुला चैथ का व्रत करेगी उसे सुख, सौभाग्य तथा पुत्र की प्राप्ति होगी।
 
यह अपने आप मे परम कल्याणकारी व सौभाग्य को बढ़ाने वाला व्रत है, इस व्रत से जहांँ कामनाएं पूर्ण होती हैं, वहीं श्रीगणेष बाधाओं को भी दूर करते हैं।