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राजस्थान का पांपरिक त्यौहार है गणगौर का पर्व on 08 Apr 2019 (Monday)

महिलाओं के लिए रखता है विशेष महत्व

आज पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति की अपनी एक अलग पहचान है। भारत में पूरे वर्ष विभिन्न प्रकार के त्यौहार मनाए जाते है। ये त्यौहार कभी धार्मिक दृष्टि से तो कभी कला और सांस्कृतिक दृष्टि से अहम होते है। इसके अलावा कई छठ पूजा और गणगौर जैसे कई पारंपरिक पर्व केवल कुछ राज्यों में ही मनाए जाते है। गणगौर का पर्व राजस्थान का मुख्य पर्व है। राजस्थान के अलावा गुजरात, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश के भी कुछ जिलों में यह पर्व मनाया जाता है।

महिलाओं के लिए विशेष है यह पर्व

गणगौर का विशेष पर्व होली के दूसरे दिन से शुरु हो जाता है और चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तक चलता है। यह पर्व मूलरुप से महिलाओं के लिए बेहद अहम होता है। हर उम्र की लड़कियां और महिलाएं बड़े ही धूम-धाम से यह पर्व मनाते है। विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए यह पूजा करती है, वहीं कुंवारी कन्याएं अच्छे वर की कामना के लिए गणगौर पूजती है।

यह पर्व नवविवाहित महिलाओं के लिए भी विशेष होता है। विवाह के पश्चात पहले गणगौर पर महिलाएं अपने मायके में यह पूजा करती है। होली के दूसरे दिन विवाहित स्त्री ससुराल से अपने घर चली जाती है एवं आठ दिन के पश्चात अपने पति के साथ ससुराल लौटती है।

गणगौर पूजा का महत्व

गणगौर का पर्व खासतौर पर सुहाग का प्रतीक है। कहा जाता है कि इस दिन मां पार्वती ने अपने हाथ में चीरा लगाकर विवाहित महिलाओं को सदा सुहागन रहने का आशीर्वाद दिया था। इस दिन भगवान ईसर जी की भी पूजा की जाती है। साथ ही ईसर जी की बड़ी बहन और जीजाजी को भी विभिन्न प्रकार के गीतों द्वारा याद किया जाता है। कहा जाता है कि जो स्त्री 16 दिन का गणगौर का व्रत करती है उसकी सभी मनोकामना भी पूर्ण होती है। गणगौर के व्रत में महिलाएं दिन में केवल एक बार ही भोजन कर सकती है।

कैसे करें गणगौर की पूजा

गणगौर का पर्व मारवाणी राजस्थानियों के लिए होली या दीवाली से कम नहीं होता। होली के दूसरे दिन सुबह जल्दी उठकर महिलाएं दूब तोड़कर लाती है एवं पानी के छांटे लगाती है। इसके पश्चात एक लकड़ी की चौंकी पर सफेद कपड़ा बिछा दिया जाता है। उस कपड़े पर चंदन या कुमकुम से स्वास्तिक का चिह्न बनाया जाता है। अब उस चिह्न पर एक पानी से भरा कलश रखकर उसके ऊपर पांच पान के पत्ते और एक नारियल रख दिया जाता है।

कलश स्थापित करने के बाद काली मिट्टी या होली की राख लेकर सोलह छोटी-छोटी पिंडिया बनाकर चौकी पर रख दी जाती है। उन पिंडियो की कुमकुम और चावल से पूजा की जाती है। इसके पश्चात दीवार पर एक पेपर लगाकर कुवारी कन्याएं आठ-आठ और विवाहित स्त्रियां सोलह-सोलह टिक्की कुमकुम,  हल्दी, मेहन्दी और काजल की लगाती है। यह सब करते हुए गोर-गोर गोमती के गीत गाए जाते है एवं नाच-गाना भी होता है।

सात दिन तक रोजाना पूरे विधि-विधान के साथ पूजा होती है और आठवें दिन गणगौर भगवान की स्थापना की जाती है। गणगौर भगवान की स्थापना सप्तमी के दिन सायंकाल में की जाती है। गणगौर के साथ दो मिट्टी के कुंड रखे जाते है, जिसमें गेहं और ज्वार बोये जाते है। महिलाएं रोजाना शाम को गीत गाते हुए, ढोल-बाजों के साथ नृत्य करती हुई यह उत्सव मनाती है। पर्व के अंतिम दिन किसी कुंड, तलाब या नदी में विनयपुर्व गणगौर भगवान का विसर्जन कर दिया जाता है।

विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करता है ये पर्व

राजस्थान पर्यटन अपनी संस्कृति और कला के लिए हमेशा से ही विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। पुष्कर मेला हो या गणगौर पूजा हज़ारों की संख्या में लोग ये पर्व देखने राजस्थान पधारते है। उदयपुर, जोधपुर और जयपुर जैसे बड़े शहरों में यह त्यौहार वाकई किसी का भी मन मोह लेता है। अगर आप गणगौर पूजा का मह्तव और अच्छी तरह से समझना चाहते है तो कम से कम एक बार इस पर्व के दौरान जयपुर का दौरा अवश्य करें।