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क्यों मनाया जाता है जानकी जयंती का पर्व on 17 Feb 2020 (Monday)

क्यों मनाया जाता है जानकी जयंती का पर्व

जानकी जंयती का पर्व फाल्गुन महीने में पड़ने वाले कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है. जानकी जयंती के दिन विशेष रूप से माता सीता की पूजा की जाती है. मान्यताओं के अनुसार अगर कोई सुहागन महिला जानकी जयंती के दिन व्रत रखकर माता सीता की विधिवत पूजा करती है तो उसके दाम्पत्य जीवन से जुडी सभी परेशानियां खत्म हो जाती है. जानकी जंयती को सीता अष्टमी भी कहा जाता है

जानकी जयंती का महत्व-

• जानकी जयंती का दिन सुहागन महिलाओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है

• जानकी जयंती के दिन सभी सुहागन महिलायें अपने पति के लंबी आयु के लिए माता सीता की श्रद्धा पूर्वक पूजा - अर्चना करती है

• जानकी जंयती के दिन विशेष रूप से माता सीता की पूजा की जाती है

• जानकी जयंती को माता सीता के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है

• जानकी जयंती के दिन सभी सुहागिन महिलायें अपने घर की सुख शांति और अपने पति की लंबी आयु के लिए उपवास करती हैं

• इस दिन राम मंदिरों में भगवान श्री राम और माता सीता की विशेष पूजा आयोजित की जाती है.

• सभी भक्त इस दिन श्रीराम और माता सीता के दर्शन करने के लिए मंदिर जाते है

• जानकी जयंती के दिन जो भी मनुष्य पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ भगवान श्री राम और माता सीता की पूजा करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है और साथ ही उसे सोलह महा दान का फल प्राप्त होता है

जानकी जयंती से जुडी विशेष बातें-

• जानकी जंयती का उपवास सभी सौभाग्यशाली महिलायें अपने पति की लंबी उम्र के लिए करती हैं

• जो भी महिला जानकी जयंती के दिन व्रत करती है उसे माता सीता के मन्त्र शुक्रमय नाम ऊं श्री सीताय नम: का जाप करना चाहिए.

• जानकी जयंती के दिन इस मन्त्र का जाप करने से बहुत अधिक लाभ प्राप्त होता है

• जो भी मनुष्य जानकी जयंती के दिन पुरे विधि विधान से श्री राम और माता सीता की पूजा करता है उसे पृथ्वीं दान का फल और साथ ही समस्त तीर्थों का फल प्राप्त होता है

• माता सीता जन्म पुष्य नक्षत्र में मगंलवार के दिन हुआ था. माता सीता के पिता का नाम राजा जनक था. इसलिए माता सीता को जानकी भी कहा जाता है.

जानकी जयंती पूजा विधि

• जो भी मनुष्य जानकी जयंती का व्रत करता है उसे सुबह प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त ( सुबह 4 बजे) जागकर नित्य क्रियाओं से निवृत होकर स्नान करने के पश्चात् स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए

• अब अपने घर के पूजा कक्ष में ज़मीन पर थोड़ा सा गंगाजल छिड़क कर शुद्ध कर ले. अब इस स्थान पर एक मंडप का निर्माण करें.

• मंडप को हमेशा 4 ,8 या 16 स्तंभों का ही बनायें.

• अब मंडप के बीच में सुदंर आसन रखकर भगवान श्री राम और माता सीता की मूर्ति स्थापित करें. आप पूजा के लिए अपनी क्षमता अनुसार सोने, चांदी, पीतल, तांबे या मिट्टी में से कोई भी मूर्ति की स्थापना कर सकते हैं.

• अगर आपके पास मूर्ति नहीं है तो आप मूर्ति की जगह भगवान् श्री राम और माता सीता की तस्वीर की भी स्थापना कर सकते हैं

• अब सबसे पहले भगवान गणेश और माता गौरी का पूजन करें

• इसके पश्चात् नीचे दिये गए मन्त्र का जाप करें और आसन, पाद्यय अर्घ्य और आचमन करें.

मन्त्र-

"ऊं श्री जानकी रामाभ्यां नम:  

• अब भगवान श्री राम को पंचामृत से स्नान करवाने के पश्चात् भगवान श्री राम और माता सीता को वस्त्र और आभूषण चढ़ाएं.

• अब माता सीता और श्रीराम को गंध, सिंदूर, चंदन, पुष्प, माला, फल, नैवेद्य,मिष्ठान अर्पित करें

• अब इनके सामने गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं.

• अब पूरी श्रद्धा के साथ भगवान श्री राम और माता जानकी कथा सुने

• कथा सुनने के पश्चात् भगवान श्री राम और माता सीता को मिष्ठान का भोग अर्पित करें.

• अब उनकी धूप और दीप से आरती उतारे

• जानकी जयंती के अगले दिन नवमी तिथि को पूजा में चढ़ाई गयी सभी वस्तुएं किसी गरीब व्यक्ति या ब्राह्मण को दान कर दें

• इसके पश्चात् मंडप को किसी पवित्र नदी में प्रवाहित कर दें.

जानकी जंयती की कथा-

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार मिथिला में बहुत भंयकर आकाल पड़ा। उस समय मिथिला के राजा जनक हुआ करते थे। वे बहुत ही पुण्यआत्मा और दयालु राजा थे। वे धार्मिक कार्यों में बहुत बढ़ चढ़कर रूचि लेते थे।ज्ञान प्राप्ति के लिए वे सभा में कोई कोई शास्त्रार्थ करवाते रहते थे और विजेताओं को गौ दान भी करा करते थे। लेकिन इस आकाल ने उन्हें विचलित कर दिया। अपनी प्रजा को भूखा मरते देख उन्हें बहुत पीड़ा होती थी। उन्होंने इस समस्या के समाधान के लिए अपने राज्य में ज्ञानी जनों को आमंत्रित किया। उस सभा में बैठे सभी ज्ञानियों ने अपनी राय राजा के सामने रखी। सभी विद्वानों ने एक ही बात पर सहमति जताई कि यदि राजा जनक स्वंय ही खेतों में हल जोतें। तो आकाल दूर हो सकता है। 


इसके बाद राजा जनक अपनी प्रजा के लिए हल उठाकर चल दिए। वह दिन था बैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि का जिस जगह पर राजा जनक ने हल चलाया वह स्थान वर्तमान समय में बिहार के सीता मणि के पुनौरा ग्राम गांव को बताया जाता है। इसके बाद राजा जनक खेतों में हल चलाने लगे। वह हल एक जगह पर आकर अटक गया। राजा जनक ने पूरी कोशिश की लेकिन हल की नोंक ऐसे धसी हुई थी कि वह निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी। इसके बाद राजा जनक ने अपने सैनिकों से कहा कि वह आसपास की जमीन की खुदाई करे और देखे की हल की नोंक कहां पर फंसी हुई है। इसके बाद सैनिकों ने वहां पर खुदाई कि जिसमें से एक बड़ा सा कलश निकला। जब कलश को खोला गया तो उसमें से एक सुंदर कन्या निकली। जिसे राजा जनक ने अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। उसी समय मिथिला में जोर से बारिश हुई और राज्य का आकाल दूर हो गया। जब उस कन्या का नामकरण किया गया तो हल की नोंक के आधार पर ही उस कन्या का नाम सीता रखा गया। जिनका विवाह आगे चलकर प्रभू श्री राम के साथ हुआ।