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काल भैरव जयंती on 19 Nov 2019 (Tuesday)

महत्व:-
कालाष्टमी के दिन कालभैरव की पूजा और व्रत रखने का विधान है। इनकी पूजा और अर्चना विधि विधान के साथ करनी चाहिए। इनका व्रत रखने से सभी तरह के कष्टों से मुक्ति मिलती है और जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। माना जाता है कि कालभैरव की पूजा करने से सभी रह के ग्रह-नक्षत्र और क्रूर ग्रहों का अशुभ प्रभाव खत्म हो जाता है। काल भैरव का स्वरूप विकराल एवं क्रोधी है। काल भैरव के एक हाथ में छड़ी होती हैं और उनका वाहन काला कुत्ता होता है इसलिए भैरव रूप में काले कुत्ते को भोजन करवाने का भी विशेष महत्व बताया जाता है। भैरव नाथ को मदिरा का प्रसाद प्रिय होता है, हालांकि उन्हें जलेबी, पुए और रोटला का प्रसाद भी चढ़ाया जाता है।
इनकी पूजा मात्र से किसी भी टोने-टोटके का असर नहीं होता है। किसी मरीज में वास करने वाली बुरी आत्मा या नकारात्मक ऊर्जा से भी छुटकारा मिलता है। शनिवार या मंगलवार को काल भैरव की पूजा से बुरी शक्तियां दूर भागती हैं।

कब और क्यों मनाई जाती है:-
कार्तिक माह की कालाष्टमी का विशेष फलदायी होती है। कार्तिक कृष्ण पक्ष के आठवें दिन कालाष्टमी होती है जिसे काल भैरव जयंती भी कहते हैं। हर महीने की कालाष्टमी से ज़्यादा महत्व कार्तिक माह की कालाष्टमी को दिया जाता है। कार्तिक के ढलते चाँद के पखवाड़े में आठवे चंद्र दिन पर पढता है। नवंबर दिसंबर के माह में यह एक ही दिन आता है, जिसे काला अष्टमी या काल भैरव जयंती कहते है। यह दिन पापियों को दंड देने वाला दिन मन जाता है, इसलिए भैरव को दंडपाणि भी कहा जाता है। कालाष्टमी के दिन शिव शंकर के इस रूप भैरव का जन्म हुआ था। भैरव का अर्थ है भय को हरने वाला, इसीलिए ऐसा माना जाता है कि कालाष्टमी के दिन जो भी व्यक्ति कालभैरव की पूजा करने से भय का नाश होता है। कालाष्टमी के दिन भगवान शिव, माता पार्वती और काल भैरव की पूजा करनी चाहिए। विद्वानों का मानना है कि ये पूजा रात में की जाती है।

मान्यताए:-
मान्यता है कि कालभैरव का व्रत रखने से उपासक की सभी मनोकामनाए पूरी हो जाती हैं। साथ ही उपरी बाधा, जादू-टोना, तंत्र-मंत्र का भय नहीं रहता है। कहते है काल भैरव को पूजने वालो को वो परम वरदान देते है। उसके मन की हर इच्छा पूरी करते है। जीवन में किसी तरह की परेशानी, डर, बीमारी, दर्द को काल भैरव दुर्र करते है। खास तौर पर कालभैरव अष्टमी पर भैरव के दर्शन करने से आपको अशुभ कर्मों से मुक्ति मिल सकती है। भैरव अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण करके उनके कर्म सिद्धि को अपने आशीर्वाद से नवाजते है। भैरव उपासना जल्दी फल देने के साथ-साथ क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त खत्म कर देती है। 

विधि:-
  • यह पूजा रात्रि में की जाती है।
  • पूरी रात शिव पारवती एवम भैरव की पूजा की जाती है।
  • भैरव बाबा तांत्रिको के देवता कह जाते है इसलिए यह पूजा रात्रि में होती है।
  • व्रत का संकल्प लें। 
  • पितरों को याद करें और उनका श्राद्ध करें। 
  • दूसरे दिन जल्दी उतर पवित्र नदी में नहाकर, श्राद्ध, तरपान किया जाता है। जिसके बाद भगवन शिव के भैरव रूप पर राख चढ़ाई जाती है।
  • धूप, काले तिल, दीपक, उड़द और सरसों के तेल से काल भैरव की पूजा करें। 
  • व्रत के सम्पूर्ण होने के बाद काले कुत्ते को मीठी रोटियां खिलाएं।
  • भोग में कई चीज़े दी जाती है।
  • इनकी पूजा करने वालो को किसी चीज़ का भय नहीं रहता और जीवन में खुशाली रहती है।
  • पूजा के समय काल भैरव की कथा सुन्ना बहुत ज़रूरी होता है। 
  • इस प्रकार यह पूजा सप्पन की जाती है।

कथा:-
एक बार भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानि त्रिदेवों के बीच इस बात को लेकर विवाद हो गया है कि उनमें से कौन सर्वश्रेष्ठ है। विवाद को सुलझाने के लिये समस्त देवी-देवताओं की सभा बुलाई गई।

  • सभा ने काफी मंथन करने के पश्चात जो निष्कर्ष दिया उससे भगवान शिव और विष्णु तो सहमत हो गये लेकिन ब्रह्मा जी संतुष्ट नहीं हुए। यहां तक कि भगवान शिव को अपमानित करने का भी प्रयास किया जिससे भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गये।
  • भगवान शंकर के इस भयंकर रूप से ही काल भैरव की उत्पत्ति हुई। सभा में उपस्थित समस्त देवी देवता शिव के इस रूप को देखकर थर्राने लगे।
  • कालभैरव जो कि काले कुत्ते पर सवार होकर हाथों में दंड लिये अवतरित हुए थे ने ब्रह्मा जी पर प्रहार कर उनके एक सिर को अलग कर दिया। ब्रह्मा जी के पास अब केवल चार शीश ही बचे उन्होंने क्षमा मांगकर काल भैरव के कोप से स्वयं को बचाया।
  • ब्रह्मा जी के माफी मांगने पर भगवान शिव पुन: अपने रूप में आ गये लेकिन काल भैरव पर ब्रह्म हत्या का दोष चढ़ चुका था जिससे मुक्ति के लिये वे कई वर्षों तक यत्र तत्र भटकते हुए वाराणसी में पंहुचे जहां उन्हें इस पाप से मुक्ति मिली।
  • भगवान काल भैरव को महाकालेश्वर, डंडाधिपति भी कहा जाता है। वाराणसी में दंड से मुक्ति मिलने के कारण इन्हें दंडपानी भी कहा जाता है।