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क्या है कलंक चतुर्थी? on 02 Sep 2019 (Monday)

क्या है कलंक चतुर्थी?

कलंक चतुर्थी गणेश चतुर्थी के दिन ही मनाई जाती है| गणेश चतुर्थी की तरह ही कलंक चतुर्थी का भी अपना महत्व है|

कलंक चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन या चन्द्रमा देखना वर्जित होता है, क्यूंकि इस दिन चंद्र दर्शन से मिथ्या कलंक या आरोप लगता है|

क्यों लगता है कलंक/क्यों लगा था चन्द्रमा को कलंक|

एक बार गणेश जी कुबेर के यहाँ भोजन के लिए आमंत्रित थे| मिठाइयों के शौकीन गणेशजी ने उस रात कुबेर के महल में पेट भरकर भोजन किया। लेकिन इतनी मिठाइयां खाने के बाद भी उनका मन नहीं भरा और वे सोचने लगे कि यहां से निकलते समय वे कुछ मिठाइयां अपने ज्येष्ठ भ्राता कार्तिकेय के लिए ले जाएंगे और कुछ स्वयं भी खा लेंगे। गणेशजी ने ढेर सारी मिठाइयों को अपनी गोद में रखा और निकल पड़े अपने मूषक पर सवार होकर। रात का अंधेरा था, लेकिन चंद्रमा की रोशनी से कैलाश पर्वत चमक रहा था। तभी गणेशजी के मूषक ने मार्ग में एक सर्प देखा और भय से उछल पड़े। इस कारण गणेशजी अपना संतुलन खो बैठे और काफी तेजी से नीचे गिर पड़े। परिणामस्वरूप उनकी सारी मिठाइयां भी धरती पर बिखर गईं।  गणेशजी तब आगे बढ़े और अपनी मिठाइयों को एकत्रित कर ही रहे थे कि उन्हें हंसने की आवाज़ सुनाई दी। उन्होंने नजर दाए-बाएं घुमाई तो उन्हें कोई ना दिखा। लेकिन जैसे ही उनकी आंखें आकाश पर पड़ीं तो उन्होंने चंद्रमा को हंसते हुए देखा। यह देख गणेशजी बेहद शर्मिंदा हुए लेकिन दूसरे ही पल उन्हें यह एहसास हुआ कि उनकी मदद करने के स्थान पर चंद्रमा उनका मजाक बना रहा है। वे पल भर में क्रोध से भर गए और चंद्रमा को चेतावनी देते हुए बोले, "घमंडी चंद्रमा! तुम इस प्रकार से मेरी विवशता का मजाक बनाते हो। यह तुम्हे शोभा नहीं देता। मेरी मदद करने की बजाय तुम मुझ पर हंस रहे हो, जाओ मैं तुम्हे श्राप देता हूं कि आज के बाद तुम इस विशाल गगन पर राज नहीं कर सकोगे। कोई भी तुम्हारी रोशनी को आज के बाद महसूस नहीं कर सकेगा। आज के बाद कोई भी तुम्हें देख नहीं सकेगा।" गणेशजी के मुख से श्राप के लफ्ज़ निकलते ही चारो ओर अंधेरा छा गया। चंद्रमा की रोशनी कहीं गायब हो गई। वह भयभीत हो गया और अगले ही पल गणेशजी के चरणों में आकर माफी मांगने लगा, "हे देव, मुझे क्षमा कीजिए। मैं आपके रूप से अनजान था और अपनी सुंदरता के घमंड में आकर ना जाने क्या-क्या कह गया”, बेहद शर्मिंदा चंद्रमा गणेशजी के चरणों में सिर रखकर रोते हुए कहने लगा। लेकिन दूसरी ओर गणेशजी का क्रोध शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। अपनी भूल को पहचानने के बाद चंद्रमा बोले, "कृपया आप मुझे माफ कर दीजिए और मुझे अपने इस श्राप से मुक्त कीजिए। यदि मैं अपनी रोशनी इस संसार पर नहीं फैला पाया तो मेरे होने ना होने का अर्थ खत्म हो जाएगा।" चंद्रमा को यूं लाचार देखकर गणेशजी का गुस्सा कम होने लगा। वे मुस्कुराए और उन्होंने चंद्रमा को माफ किया परन्तु बोले, "तुम्हें अपनी गलती का आभास हो गया यह अच्छी बात है। लेकिन मैं अब चाहकर भी अपना श्राप वापस नहीं ले सकता। परन्तु इस श्राप के असर को कम करने के लिए मैं तुम्हे एक वरदान जरूर दे सकता हूं| वे मुस्कुराए और उन्होंने चंद्रमा को माफ किया परन्तु बोले, "तुम्हें अपनी गलती का आभास हो गया यह अच्छी बात है। लेकिन मैं अब चाहकर भी अपना श्राप वापस नहीं ले सकता। परन्तु इस श्राप के असर को कम करने के लिए मैं तुम्हे एक वरदान जरूर दे सकता हूं| गणेशजी ने चंद्रमा से कहा कि ऐसा अवश्य होगा कि तुम अपनी रोशनी खो दोगे लेकिन एक माह में ऐसा केवल एक ही बार होगा। इसके बाद तुम फिर से समय के साथ वापस बढ़ते जाओगे और फिर 15 दिनों के अंतराल में अपने सम्पूर्ण वेष में नजर आओगे। गणेशजी का दिया हुआ यह श्राप आज भी कार्य करता है। आज भी चंद्रमा धीरे-धीरे कम होता है और माह में एक दिन अपने पूर्ण आकार में आता है, जिसे पूर्णमासी कहा जाता है। गणेशजी के इस वरदान को पाकर चंद्रमा बेहद खुश हुआ और उन्हें धन्यवाद कहने लगा लेकिन तभी गणेशजी ने एक और चेतावनी देते हुए कहा, "मेरे द्वारा दिया हुआ श्राप और वरदान दोनों जरूर काम करेंगे लेकिन साथ ही तुमने मेरा जो अपमान किया है उसे सारा संसार याद रखेगा। तुमने चतुर्थी के दिन मेरा अपमान किया है इसलिए जो भी मेरा भक्त इस दिन तुम्हें देखेगा तो उसके लिए यह अशुभ संकेत बन जाएगा और उसे मिथ्य कलंक का सामना करना पड़ेगा|