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जानिए क्या है कुम्भ संक्रांति का महत्व और पूजन विधि on 13 Feb 2020 (Thursday)


जानिए क्या है कुम्भ संक्रांति का महत्व और पूजन विधि

शास्त्रों में बताया गया है की जब सूर्य मकर राशी से कुम्भ राशी में प्रवेश करता है तो उस तिथि को कुम्भ संक्रांति के रूप में मनाया जाता हैं. पुरे साल में पड़ने वाली 12 संक्रतियों में से कुम्भ संक्राति फाल्गुन मॉस में और 11वे क्रम पर आती हैं. कुम्भ संक्रांति हमेशा एक ही तिथि पर नहीं मनाई जाती हैं. हमेशा सूर्य के दिशा और स्थिति के मुताबिक़ कुम्भ संक्राति का पर्व मनाया जाता हैं. ज़्यादातर कुम्भ संक्रांति का पर्व फरवरी या मार्च महीने में मनाया जाता हैं.

कुम्भ संक्रांति का महत्व-

• कुम्भ संक्रांति के दिन विश्व के सबसे बड़े मेले अर्थात कुम्भ मेले का आरम्भ हो जाता हैं

• इस मेले को देखने और पवित्र नदी में स्नान करने के लिए लाखों श्रद्धालु नदी के किनारे इक्क्ठा होते हैं

• शास्त्रों में कुम्भ संक्रांति के दिन गंगा नदी में स्नान करना बहुत ही शुभ और पवित्र माना गया हैं

• शास्त्रों के अनुसार कुम्भ संक्रांति के दिन गंगा नदी में स्नान करने से मनुष्य द्वारा किये गए बुरे काम और पापों से छुटकारा मिलता है

• अगर आपके घर के आस पास गंगा नदी नहीं है तो आप अपने नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर भी स्नान कर सकते हैं.

कुम्भ संक्रांति से जुडी विशेष बाते-

• इस दिन पूरे भारतवर्ष में कुम्भ संक्राति का पर्व बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता हैं. पर पूर्वी भारत के इलाकों में इस पर्व को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता हैं

• पश्चिम बंगाल में रहने वाले लोग कुम्भ संक्रांति को शुभ फाल्गुन मास के आरम्भ के रूप में मनाते हैं

• मलयालम कैलेंडर के मुताबिक कुम्भ संक्रांति का पर्व मासी मासम के रूप में मनाया जाता है

• इस दिन सभी लोग पवित्र स्नान और दर्शन करने के लिए इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक जैसी जगहों पर जाते हैं.

• कुम्भ संक्रांति के दिन सभी लोग अपने उज्वल भविष्य की कामना के लिए भगवान् से प्रार्थना करते हैं

• कुम्भ संक्रांति के दिन धार्मिक स्थलों पर अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत भीड़भाड़ रहती है

• कई शताब्दियों से हिन्दू धर्म में कुम्भ संक्राति का पर्व बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है

• इतिहास में भारत के महान और प्रतापी राजा हर्षवर्धन के वक़्त पहले कुम्भ मेले और कुम्भ संक्राति का उल्लेख किया गया हैं

• इतिहास में इस बात का उल्लेख किया गया है की जिस वक़्त राजा हर्षवर्धन का शासनकाल था तभी से कुम्भ मेलों का आयोजन होना शुरू हो गया था

• कुम्भ मेले का आयोजन हर तीन साल में हरिद्वार में गंगा, इलाहाबाद में यमुना, उज्जयिनी(उज्जैन) में शिप्रा, नासिक में गोदावरी जैसी नदियों के तट पर किया जाता हैं

• पुराण भागवत पुराण में भी कुम्भ संक्राति का उल्लेख मिलता हैं.

कैसे करें कुम्भ संक्रांति की पूजा-

• शाश्त्रो में बताया गया है की कुम्भ संक्रांति के दिन अन्य संक्राति की तरह अन्न, कपडे और अन्य जरुरी सामान ब्राह्मण पंडितों को दान देना शुभ होता हैं.

• कुम्भ संक्रांति के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व माना जाता हैं

• मान्यताओं के अनुसार कुम्भ संक्रांति के गंगा नदी में स्नान करने से मनुष्य द्वारा किये गए जन्मो जन्मों के पाप नष्ट हो जाते है और मृत्यु के पश्चात् मोक्ष्य की प्राप्ति होती हैं.

• कुम्भ संक्रांति के दिन शुद्ध मन और पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ गंगा जी की आरती और पूजन पाठ करना चाहिए.

• जो लोग गंगा में स्नान करने में असमर्थ हैं वो लोग कुम्भ संक्रांति के दिन शिप्रा, यमुना और गोदावरी नदी में भी स्नान कर सकते हैं.

• कुम्भ संक्राति के दिन गौदान करने को भी  बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. शास्त्रों के अनुसार इस दिन गाय दान करने से सुख और वैभव की प्राप्ति होती हैं.