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लाभ पंचमी on 01 Nov 2019 (Friday)

महत्व:-
लाभ पंचमी के दिन किसी नए व्यवसाय के काम को शुरू कारण अबहूत शुभ मानते है। गुजरात में इस त्यौहार का बहुत महत्व है। वह इसको बड़ी धूमधाम से मानते है। इस दिन से वह व्यवसायी लोग नया बहीखाता शुरू करते है। वह इसे खाटू कहते है। इसमें सबसे पगले कुमकुम से बायीं तरफ शुभ और दाहिने तरफ लाभ लिखते है। इसके बिच में सठिया बनाते है। इस दिन लक्ष्मी की पूजा करते है, जैन समुदाय ज्ञानवर्धक पुस्तक की पूजा करते है। साथ ही और अधिक बुद्धि ज्ञान के लिए प्रार्थना करते हैं।

कब और क्यों मनाई जाती है:-
लाभ पंचमी कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष के दिन आती है। इसे ज्ञान पंचमी। लोकहि पंचमी भी कहते है। लाभ पंचमी को भारतवर्ष में दीपावली के अंतिम पर्व के रूप में भी मनाया जाता है | कार्तिक शुक्ल पक्ष पंचमी को सौभाग्य पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। सौभाग्य पंचमी जीवन में सुख और सौभाग्य की वृद्धि करती है इसलिए पंचमी को सौभाग्य पंचमी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा सभी सांसारिक कामनाओं का पूरा कर परिवार में सुख-शांति लाती है तथा श्री गणेश पूजन समस्त विघ्नों का नाश कर काराबोर को समृद्ध और प्रगति प्रदान करता है। जीवन में हर व्यक्ति कार्यक्षेत्र के साथ पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना रखता है। इसलिए यह सौभाग्य पंचमी पर्व सुख-शांति और खुशहाल जीवन की ऐसी इच्छाओं को पूरा करने की भरपूर ऊर्जा प्राप्त करने का शुभ अवसर होता है।

मान्यताए:-
लाभ पंचमी को भाग्य, लाभ के लिए अति श्रेष्ठ दिन मन जाता है। मान्यता है की लाभ पंचमी के दिन भग्वान श्री गणेश जी की पूजा आराधना करने से जीवन, घर, कारोबार में लाभ, सौभाग्य और सफलता प्राप्त होती है। जीवन, व्यवसाय और परिवार में लाभ, अच्छा भाग्य, उन्नति आती है। गुजरात में व्यापारियों का यह दिन नया वर्ष होता है। इसी दिन दीपावली का पर्व मनाकर अपने कार्यो की शुरुआत करते है। लाभ पंचमी को लाभ पाचम भी कहते हैं। लाभ पंचमी को भारतवर्ष में दीपावली के अंतिम पर्व के रूप में भी मनाया जाता है| 

विधि:-
  • इस दिन गणेश के साथ भगवान शिव का स्मरण शुभफलदायी होता है। 
  • सुख-सौभाग्य और मंगल कामना को लेकर किया जाने वाला सौभगय पंचमी का व्रत सभी की इच्छाओं को पूर्ण करता है। 
  • इस दिन भगवान के दर्शन व पूजा कर व्रत कथा का श्रवण करते हैं। 
  • सौभाग्य पंचमी पूजन के दिन प्रात: काल स्नान इत्यादि से निवृत होकर सूर्य को जलाभिषेक करने की परंपरा है। 
  • फिर शुभ मुहूर्त में विग्रह में भगवान शिव व गणेश जी की प्रतिमाओं को स्थापित की जाती है। 
  • श्री गणेश जी को सुपारी पर मौली लपेटकर चावल के अष्टदल पर विराजित किया जाता है। 
  • भगवान गणेश जी को चंदन, सिंदूर, अक्षत, फूल, दूर्वा से पूजना चाहिए तथा भगवान आशुतोष को भस्म, बिल्वपत्र, धतुरा, सफेद वस्त्र अर्पित कर पूजन किया जाता है।
  • उसके बाद गणेश को मोदक व शिव को दूध के सफेद पकवानों का भोग लगाया जाता है।  
  • निम्न मंत्रों से श्री गणेश व शिव का स्मरण व जाप करना चाहिए। 
  • गणेश मंत्र – लम्बोदरं महाकायं गजवक्त्रं चतुर्भुजम्। आवाहयाम्यहं देवं गणेशं सिद्धिदायकम्।।
  • शिव मंत्र – त्रिनेत्राय नमस्तुभ्यं उमादेहार्धधारिणे। त्रिशूलधारिणे तुभ्यं भूतानां पतये नम:।। 
  • इसके पश्चात मंत्र स्मरण के बाद भगवान गणेश व शिव की धूप, दीप व आरती करनी चाहिए। 
  • द्वार के दोनों ओर स्वस्तिक का निर्माण करें तथा भगवान को अर्पित प्रसाद समस्त लोगों में वितरित करें व स्वयं भी ग्रहण करें।