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मंगला गौरी व्रत

भारत वर्ष में परंपरागत रूप से कई व्रत पर्वो को मनाया जाता है। जिसमें कई त्यौहार व व्रत बहुत ही प्रचलित और जन प्रिय हैं। देवी-देवता जो कि इस संसार की सत्ता के रक्षक व षक्ति के प्रतीक हैं तथा जिस परम षक्ति परमेष्वर के हाथों में जीवन की उत्पत्ति व प्रलय का भार उसे हम कई रूपों मंे देखते व पाते हैं। माँ भगवती गौरी जो कि साक्षात् इस संसार की उत्पत्ति व प्रलय की दात्री है, उन्हें हम जगदम्बा, सती, दुर्गा, पार्वती, उमा, के रूपों में जानते हैं। विभिन्न समय में अलग उद्देष्यों की पूर्ति हेतु अर्थात् समय-समय पर असुरों के अत्याचार से इस संसार व भक्त जनों को मुक्ति दिलाने, उनका कल्याण करने के लिए माँ गौरी अनेक रूपों में प्रकट हुई। 

गौरी तृतीया का व्रत माँ गौरी की पूजा में समर्पित हैं। यह व्रत सुख ,सौभाग्य की कामना से स्त्रियों द्वारा रखा जाता है। इस व्रत में सौभाग्यवती स्त्रियां विविध प्रकार के सौभाग्य की सामग्री वस्त्राभूषण से मां पार्वती (गौरी) तथा भगवान षिव की पूजा श्रद्धा विष्वास के साथ करती हैं। जिससे उन्हें माँ गौरी की कृपा से अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है तथा इस संसार के समस्त सुख उन्हंे सहज ही मिल जाते हैं और अंत मे षिव लोक की प्राप्ति होती है। व्रत में तामसिक आहारों, अन्न से दूर रहने व विन्रम व्यवहार करने का विधान है। इस व्रत में श्रृंगार की सभी वस्तुओं सहित षोड़षोपचार विधि से मां गौरी सहित भगवान षिव, गणेष, अर्थात् सम्पूर्ण षिव परिवार की पूजा करनी चाहिए व दान, दक्षिणा, ब्राह्मण व धर्म स्थलों में देने से व्रती के पुण्य उदय होते है तथा व्रती स्त्री को सुख, सौभाग्य, पुत्र, धन, यष, मोक्ष की प्राप्ति होती है यह व्रत हरितालिका तीज की तरह ही विषेषकर सुहागिन स्त्रियों का व्रत है। गौरी तृतीया व्रत सुख, सौभाग्य व अरोग्यता को बढ़ा जीवन को नाना प्रकार के ऐष्वर्य से भर देता है मां गौरी का व्रत बड़ा ही पुण्यदायक व विषिष्ट है।