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मोक्षदा एकादशी on 08 Dec 2019 (Sunday)

मोक्षदा एकादशी

मोक्षदा एकादशी को एक बहुत ही महत्वपूर्ण एकादशी माना जाता है । इस दिन बहुत ही अधिक महत्तव इसलिये भी है क्योकि इस भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में अर्जुन को श्रीमद्भगवद् गीता का ज्ञान दिया था। 

मह्त्तव – 
हम सभी जानते हैं कि किस प्रकार गीता का ज्ञान आम मनुष्य के लिये भी कितना लाभदायी रहा है। इस विशेष स्थल को अब ज्योतिष तीर्थ के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा यह भी माना जाता है कि जो कोई व्यक्ति इस दिन एक योग्य व्यक्ति को भगवद गीता भेंट करता है, उसे श्रीकृष्ण भगवान का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है ।

क्या करें 
• इस दिन सुबह के समय लकड़ी की दातुन करें
• इसके अलावी नींबू, जामुन या आम के पत्तो को चबाना भी काफी लाभकारी माना जाता है।
• रात्रि को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए 
• इसके अलावा सभी प्रकार के भोग-विलास से दूर रहना चाहिए।
• इस दिन आप केला, आम, अंगूर, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन कर सकते हैं।
• इस दिन ब्राह्मणों को भोग लगाना चाहिये
• ॐ नमो भगवते वासुदेवाय:|| मंत्र का जाप करें


क्या ना करें – 

• इस विशेष दिन किसी भी प्रकार से मांस, लहसुन, प्याज, मसूर की दाल आदि का सेवन ना करें।निषेध वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए।
• इसके अलावा वृक्ष से पत्ता तोड़ने की मनाही होती है।
• इस दिन व्रतधारी व्यक्ति को गाजर, शलजम, गोभी, पालक, इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए।
• क्रोध ना करे

मान्याताएं 

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार इस व्रत का पालन करने से अपने पितरों ’या मृत पूर्वजों को मोक्ष या मुक्ति प्रदान की जा सकती है। इस दिन को गीता जयंती के रूप में भी माना जाता है। क्योंकि इस दिन, कुरुक्षेत्र के महाकाव्य युद्ध के दौरान प्रसिद्ध हिंदू ग्रंथ, भगवान कृष्ण जी के द्वारा अर्जुन को सुनाया गया था इस कारण इसका विशेष महत्व है। मोक्षदा एकादशी का महत्व वैष्णवों यानि कि भगवान विष्णु के अनुयायियों के लिए भी काफी अधिक होता है। इस दिन गीता को भेट करना बहुत ही अधिक शुभ माना जाता है। इस दिन गीता को सुनने से बहुत अधिक लाभ मिलता है। विष्णु पुराण में यह भी कहा गया है कि मोक्षदा एकादशी व्रत हिंदू वर्ष में अन्य प्रकार की 23 एकादशी व्रतों के संयुक्त लाभों के बराबर लाभ देती है और इसी कारण यह व्रत रखना बहुत ही फलदायी है।

मोक्षदा एकादशी की कथा 

मोक्षदा एकादशी का व्रत मनुष्‍यों के पाप दूर कर उनका उद्धार करने वाले श्री हरि के नाम से रखा जाता है. एक कथा के अनुसार चंपा नगरी में एक प्रतापी राजा वैखानस रहा करते थे. चारों वेदों के ज्ञाता राजा वैखानस बहुत प्रतापी और धार्मिक राजा थे. उनकी प्रजा खुशहाल और संपन्‍न थी. एक दिन राजा ने सपना देखा, जिसमें उनके पिता नरक में यातनाएं झेलते दिखाई दिए. सपना देखने के बाद राजा बेचैन हो उठे और सुबह होते ही उन्‍होंने पत्‍नी को सबकुछ बता दिया. राजा ने यह भी कहा, 'इस दुख के कारण मेरा चित्त कहीं नहीं लग रहा है, मैं इस धरती पर सम्‍पूर्ण ऐशो-आराम में हूं और मेरे पिता कष्‍ट में हैं.' पत्‍नी ने कहा महाराज आपको आश्रम में जाना चाहिए. 


राजा आश्रम गए. वहां पर कई सिद्ध गुरु थे, जो तपस्‍या में लीन थे. राजा पर्वत मुनि के पास गए और उन्‍हें प्रणाम कर उनके पास बैठ गए. पर्वत मुनि ने मुस्‍कुराकर आने का कारण पूछा. राजा अत्‍यंत दुखी थे और रोने लगे. तब पर्वत मुनि ने अपनी दिव्‍य दृष्‍टि से सब कुछ जान लिया और राजा के सिर पर हाथ रखकर बोले, 'तुम एक पुण्‍य आत्‍मा हो, जो अपने पिता के दुख से इतने दुखी हो. तुम्‍हारे पिता को उनके कर्मों का फल म‍िल रहा है. उन्‍होंने तुम्‍हारी माता को तुम्‍हारी सौतेली माता के कारण बहुत यातनाएं दीं. इसी कारण वे इस पाप के भागी बने और अब नरक भोग रहे हैं.' राजा ने पर्वत मुनि से इसका हल पूछा इस पर मुनि ने उन्‍हें मोक्षदा एकादशी का व्रत का पालन करने और इसका फल अपने पिता को देने के लिए कहा. राजा ने विधि पूर्वक व्रत किया और व्रत का पुण्‍य अपने पिता को अर्पण कर दिया. व्रत के प्रभाव से राजा के पिता के सभी कष्‍ट दूर हो गए. उन्‍हें नरक के कष्‍टों से मुक्ति म‍िल गई. स्‍वर्ग को जाते उन्‍होंने अपने पुत्र को आशीर्वाद भी दिया.   
 
अंत में – 
इस प्रकार से यह व्रत बहुत ही लाभदायी है । इसको रखने से विशेष लाभ मिलते है।