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जानिए क्यों मनाया जाता है नरक चतुर्दशी का पर्व on 27 Oct 2019 (Sunday)

  •  दीपावली का त्योहार हिंदू धर्म का सबसे बड़ा त्यौहार है. इस दिन सभी लोग अपने घर में दिए जलाकर मां लक्ष्मी की पूजा अर्चना करते हैं. 
  • दीपावली के दिन को रौशनी के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है. दीपावली से 1 दिन पहले नरक चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है.
  • नरक चतुर्दशी का त्योहार हर साल कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी यानी दीपावली के 1 दिन पहले पड़ता है. नरक चतुर्दशी के त्यौहार को छोटी दिवाली भी कहा जाता है.
  • नरक चतुर्दशी को नरक मुक्ति का त्योहार कहा जाता है.
  • नरक चतुर्दशी के दिन प्रातः काल सूर्योदय से पहले नहाने के बाद यम तर्पण किया जाता है और शाम के समय दीप दान करके यमराज की पूजा की जाती है.
  • इस दिन दीपदान का बहुत महत्व होता है. नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले नहाने का भी बहुत महत्व होता है.
  • इस दिन नहाते वक्त तिल और तेल के उबटन को शरीर पर लगाकर नहाया जाता है और नहाने के बाद सूर्य देव को जल अर्पित किया जाता है.
  • नरक चतुर्दशी के दिन शरीर पर चंदन का लेप लगाकर नहाने का बहुत महत्व है. नरक चतुर्दशी के दिन भगवान कृष्ण की पूजा अर्चना करने का भी नियम है.
  • नरक चतुर्दशी के दिन घर के दरवाजे पर दीप जलाए जाते हैं और साथ ही यमराज की पूजा भी की जाती है.
नरक चतुर्दशी के दिन करें हनुमान जी की पूजा :-
  • इस दिन हनुमानजी की पूजा अर्चना करने का भी बहुत महत्व होता है. नरक चतुर्दशी के दिन कई जगहों पर हनुमान जयंती का पर्व भी मनाया जाता है.
  • एक मान्यता के अनुसार नरक चतुर्दशी यानी कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन माता अंजना के गर्भ से हनुमान जी ने अवतार लिया था.
  • जो लोग अपने दुख और तकलीफों से मुक्ति पाना चाहते हैं वह इस दिन हनुमान जी की पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ पूजा और आराधना करते हैं.
  • कई लोग नरक चतुर्दशी के दिन हनुमान चालीसा हनुमान अष्टक आदि का पाठ करते हैं. बाल्मीकि  रामायण में नरक चतुर्दशी के दिन हनुमान जयंती होने का उल्लेख किया गया है.
  • इसलिए साल में 2 बार हनुमान जयंती का त्यौहार मनाया जाता है.
  • कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के अलावा चैत्र पूर्णिमा के दिन भी हनुमान जयंती का त्यौहार मनाया जाता है. 
नरक चतुर्दशी कथा :-
बहुत समय पहले रंतिदेव नाम के एक प्रतापी राजा राज्य करते थे. राजा रंतिदेव का स्वभाव बहुत ही शांत और मृदुल था. यह हमेशा सभी लोगों का भला चाहते थे और गलती से भी कभी किसी का बुरा नहीं करते थे. जब इनका अंत समय आया तब यमदूत राजा के पास उनके प्राण हरने के लिए आए और तब इन्हें पता चला कि इन्हें मृत्यु के बाद मोक्ष की जगह नरक की प्राप्ति होगी. तब उनके मन में यह सवाल आया कि जब मैंने कभी भी किसी का बुरा नहीं किया या कभी कोई पाप नहीं किया तो मुझे नरक की यातना और कष्ट क्यों सहनी पड़ेगी. तब राजा रंतिदेव ने अपने मन की दुविधा को दूर करने के लिए यमदूत से नरक भोगने का कारण पूछा. तब यमदूत ने राजा रंतिदेव की शंका का समाधान करते हुए राजा को बताया कि एक बार आपके दरवाजे पर एक ब्राम्हण आया था पर आपकी गलती के कारण वह ब्राम्हण आपके दरवाजे से भूखा लौट गया. जिसकी वजह से आपको नर्क की यातना झेलनी पड़ेगी. तब राजा रंतिदेव को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने यमदूत से प्रार्थना की कि उन्हें अपनी गलती सुधारने का एक मौका और दिया जाए. राजा रंतिदेव के अच्छे स्वभाव को देखते हुए यमदूत ने उन्हें अपनी गलती सुधारने का मौका दिया. तब राजा रंतिदेव ने अपने गुरु से सारी बातें बता कर उपाय पूछा. तब उनके गुरु ने यह आज्ञा दी कि अगर वह नरक यातना से मुक्ति पाना चाहते हैं तो  एक हजार ब्राह्मणों को भोजन करवाकर उनसे क्षमा याचना करें. राजा रंतिदेव ने अपने गुरु की आज्ञा का पालन किया और 1000 ब्राह्मणों को भोजन करवाकर उनसे क्षमा याचना की. ब्राम्हण राजा रंतिदेव से बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया. ब्राह्मणों के आशीर्वाद के प्रभाव से राजा रंतिदेव को उनके किए गए पाप से मुक्ति मिली और मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त हुआ. ऐसा कहा जाता है कि इस दिन कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चौदस थी. इसलिए इसे नरक निवारण चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है.

हमारे धर्म पुराणों में नरक चौदस को लेकर एक और कथा बहुत ही प्रचलित है

ऐसा बताया जाता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि के दिन श्री कृष्ण ने नरकासुर नाम के राक्षस का वध किया था. नरकासुर राक्षस ने 16000 कन्याओं को बंदी बनाकर रखा था. श्री कृष्ण ने नरकासुर का अंत कर के 16000 कन्याओं को उसकी कैद से मुक्त करवाया था. तब कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा कि अब हमें समाज स्वीकार नहीं करेगा. इसलिए आप ही कोई रास्ता दिखाएं. श्री कृष्ण ने समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से 16000 कन्याओं से विवाह कर लिया. इस दिन नरकासुर का संघार और 16000 कन्याओं के बंधन मुक्त होने के कारण नरक चतुर्दशी के दिन दीपदान करने की प्रथा शुरू की गई. एक दूसरी मान्यता के अनुसार नरक चौदस के दिन सुबह सूर्योदय से पूर्व नहाकर यमराज की पूजा करने और शाम के समय दीपदान करने का नियम है. जो भी व्यक्ति ऐसा करता है उसे कभी भी नर्क की यातना और अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है. इसी वजह से नरक चतुर्दशी के दिन दीपदान और पूजा करना बहुत महत्वपूर्ण होता है.

नरक चौदस का रूप व् महिमा :-
नरक चौदस को रूप चौदस के रूप में भी मनाया जाता है. नरक चौदस को रूप चतुर्दशी के रूप में मनाने का एक बहुत बड़ा कारण है:
एक बार हिरण्यगर्भ नाम के एक राजा राज्य करते थे. एक समय राजा का मन मोह माया को छोड़कर भगवान की तपस्या लीन होने का विचार आया.  तब राजा ने अपने मन की बात को मान कर अपना राज्य पाठ सभी कुछ त्याग दिया  और मोह माया के बंधन को छोड़कर जंगल में जाकर भगवान की तपस्या करने लगे. राजा हिरण्यगर्भ ने कई सालों तक लगातार भगवान की तपस्या की.राजा हिरण्यगर्भ भगवान् की तपस्या में इतना लीन हो गए की तपस्या करते करते उनके शरीर पर कीड़े लग गए और उनका पूरा शरीर सड़ गया.हिरण्यगर्भ को इस बात का बहुत दुख हुआ और उन्होंने नारद मुनि से अपनी सारी व्यथा कहीं. तब नारद मुनि ने उनसे कहा कि आप तपस्या करते वक्त अपने शरीर की स्थिति को सही नहीं रखते हैं. जिसकी वजह से आपके शरीर में कीड़े लग गए और आपका शरीर सड़ गया. तब हिरण्यगर्भ ने नारद मुनि से इस समस्या का समाधान पूछा. तब नारद मुनि ने राजा हिरण्यगर्भ को बताया कि कार्तिक मास कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के दिन शरीर पर लेप लगाकर सूर्य निकलने से पहले नहाए और नहाने के बाद रूप के देवता कृष्ण की पूजा आरती करें. ऐसा करने से आपको आपका रूप दोबारा मिल जाएगा. राजा हिरण्यगर्भ ने नारद मुनि की बात मानकर वैसा ही किया. ऐसा करने से उनका शरीर फिर से पहले की तरह स्वस्थ और रूप वान हो गया. इसीलिए इस दिन रूप चतुर्दशी का त्यौहार भी मनाया जाता है. रूप चौदस या नरक चौदस दीपावली के 1 दिन पहले मनाया जाता है. इस दिन सभी लोग अपने अपने घरों में दीपदान करते हैं और अपने घर के मुख्य द्वार पर दिए जाते हैं. दीपावली का त्यौहार धूमधाम के साथ साथ खुशियों से भरा भी होता है. दीपावली के 1 दिन पहले मनाए जाने के कारण इसे छोटी दीवाली भी कहते हैं.