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प्रदोष व्रत का अर्थ व महत्व on 11 Sep 2019 (Wednesday)

प्रदोष का अर्थ है "भरी दोष"| चन्द्रमा को श्रेय रोग होने के कारण चंद्र देव अंतिम साँसे गिन रहे थे| तभी भगवान् शंकर ने चन्द्रमा को पुनर्जीवन देकर मस्तक पर धारण किया| चंद्र मृत्यु के निकट जाकर भी भगवान् शिव की कृपा से जीवित रहे और पूरनमाशी के दिन तक पूर्णता स्वस्थ होक प्रकट हुए|

प्रदोष व्रत महत्व

जीवन में शारीरिक मानसिक एवं आधयात्मिक रूप से मज़बूत होने के लिए प्रदोष व्रत कारगर मन गया हैप्रदोष व्रत एक ऐसा व्रत है जो मृत्यु के निकट पोहोंचे हुए मनुष्य को जीवन दान देता है| प्रदोष व्रत हर माह के दोनों पक्षों की त्रयोदशी को मनाया जाता है| भगवान् शिव की विशेष और अनंत कृपा पाने के लिए यह व्रत कारगर है| हिन्दू धर्म शास्त्रों में इस व्रत का विशेष महत्व बताया गया है| इस व्रत को हर माह के दोनों पक्षों को करने से व्यक्ति के जीवन के सब कष्टों का निवारण होजाता है| प्रदोष व्रत का अपना महत्व है, परन्तु दिन के अनुसार पड़ने वाले प्रदोष व्रत का अपना अलग महत्व होता है|

दिन के अनुसार प्रदोष व्रत और उनका महत्व

रविवार:- रविवार के दिन पड़ने वाली प्रदोष का सम्बन्ध देव सूर्य से होता है| इससे भानु प्रदोष या रवि प्रदोष कहा जाता हैरवि प्रदोष का व्रत सूर्य को मज़बूत व् उनकी कृपा पाने के लिए बहुत ही शुभ माना गया है| यदि जीवन में अपयश या हड्डियों की समस्या का दोष हो तो रविवार के दिन आने वाली प्रदोष का व्रत करें| सूर्य सम्बंदि सभी समस्याओं का निवारण करता है, रवि प्रदोष|

सोमवार:- सोमवार के दिन आने वाली प्रदोष का सम्बन्ध चन्द्रमा से है| किसी का चन्द्रमा दूषित हो या अशुभ फल दायक हो तो सोम प्रदोष का व्रत अवश्ये करना चाहिए| सोम प्रदोष सब प्रदोष में सबसे शुभ फल दायी है| सोम प्रदोष का व्रत करने से भगवान् शिव और चन्द्रमा दोनों का ही आशिर्वाद प्राप्त किया जा सकता है| सोम प्रदोष का व्रत विशेष मनोकामनाओ की पूर्ती के लिए महत्वपूर्ण है|

मंगलवार:- मंगलवार के दिन आने वाली प्रदोष को भौम प्रदोष कहते हैं| मंगलवार को आने वाली प्रदोष का सम्बन्ध राम के सबसे प्रिय भक्त हनुमान जी से है| जिस भी व्यक्ति को मंगल ग्रह से कष्ट हो या मंगल दोष हो, उस व्यक्ति को मंगल के दिन आने वाली प्रदोष का व्रत करना चाहिए| मंगल प्रदोष हर तरह के रोग से मुक्ति मिलती है| अथवा मंगल प्रदोष क़र्ज़ से छुटकारा भी दिलाती है|

बुधवार:- बुधवार के दिन पड़ने वाली प्रदोष को सौम्यवारा प्रदोष कहा जाता है| इस प्रदोष का सम्बंन्ध भगवन शिव के पुत्र गणेश जी से होता है|जिस वभि व्यक्ति को ज्ञान व् बुद्धि को बढ़ाना हो उसके लिए सौम्यवारा प्रदोष कारगर होगी| यह प्रदोष ज्ञान व् शिक्ष में वृद्धि करता है|

गुरुवार:- गुरुवार के दिन आने वाली प्रदोष को गुरुवार प्रदोष कहा जाता है| गुरुवार के दिन आने वाली प्रदोष का सम्बंन्ध भगवन विष्णु और देव बृहस्पति से है| यह व्रत हर प्रकार के कार्य में सफलता दिलाता है| इस व्रत को करने से कुंडली में बृहस्पति मज़बूत होते है| यह व्रत शत्रुओं पर विजय दिलाता है| इस व्रत को करने से पितरों का आशीर्वाद भी मिलता है|

शुक्रवार:- शुक्रवार के दिन पड़ने वाली प्रदोष का सम्बन्ध देव शुक्र से होता है और इसे भृगुवारा प्रदोष कहते हैं| यह व्रत अखंड सौभाग्य व् सुखद वैवाहिक जीवन के लिए किया जाता है| इस व्रत के फल बहुत ही शुभ होते है| यह व्रत हर तरह का सुख व् सम्पन्नता प्राप्त कराता है| जिस व्यक्ति को धन की समस्या हो तो उसके निवारण के लिए भृगुवारा प्रदोष का व्रत करना चाहिए|

शनिवार:- शनिवार को आनेवाली प्रदोष को शनि प्रदोष कहा जाता है| शनि प्रदोष भगवान् शिव के भक्त शनि देव से सम्बंन्ध रखती है| इस दिन जो भी मनुष्य व्रत रखता है उसे पुत्र प्राप्ति व् हर नौकरी में उच्च पद की प्राप्ति होती है| यह व्रत जीवन के हर लक्ष्य में सफलता दिलाने के लिए बहुत फलदायक है|

सावधानी

प्रदोष व्रत पूर्ण रूप से तिथि पर निर्भर करता है| इसीलिए प्रदोष व्रत कभी कभी द्वादशी तिथि से ही शुरू हो जाता है क्यूंकि, सूर्यास्त के तुरंत बाद त्रयोदशी लगते ही व्रत आरम्भ होजाता है|

पूजन विधि

व्रत रखने वाले व्यक्ति को व्रत के दिन सूर्य उदय होने से पहले उठना चाहिये।

स्नान आदिकर भगवान् शिव का नाम जपते रहना चाहिए|

इस व्रत में दो वक्त पूजा करि जाती है एक सूर्य उदय के समय और एक सूर्यास्त के समय प्रदोष काल में|

व्रत में अन्न का सेवन नहीं करेंगे, फलाहार व्रत करेंगे|

सुबह नहाने के बाद साफ और चमकदार श्वेत वस्त्र पहनें।

फिर उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे और गौरी शंकर भगवान् का सयुंक्त पूजन करें।

उन्हें सफ़ेद व् लाल फूलों की माला अर्पित करें. बेल पत्र अर्पित करें|

सफ़ेद मिठाई (पताशे,रसगुल्ले) फल का भोग लगाएं|

ही व् टिल के तेल का दीपक लगाएं, धुप अगरबत्ती भी लगाएं.

भगवान् शिव को चन्दन की सगंध अर्पित करें|

दूर्वा अर्पित करें भगवान् गणश और शिव जी को|

भगवान् गणेश का पूजन कर अपनी पूजा प्रारम्भ करे|

पूजा में 'ऊँ नम: शिवाय' का जाप करें और जल चढ़ाएं।

प्रदोष व्रत कथा

किसी समय सभी प्राणियों के हितार्थ परम् पुनीत गंगा के तट पर ऋषि समाज द्वारा एक विशाल सभा का आयोजन किया गया, जिसमें व्यास जी के परम् प्रिय शिष्य पुराणवेत्ता सूत जी महाराज हरि कीर्तन करते हुए पधारे शौनकादि अट्ठासी हजार ऋषि-मुनिगण ने सूत जी को दण्डवत् प्रणाम किया सूत जी ने भक्ति भाव से ऋषिगण को आशीर्वाद दे अपना स्थान ग्रहण किया

ऋषिगण ने विनीत भाव से पूछा, "हे परम् दयालु! कलियुग में शंकर भगवान की भक्ति किस आराधना द्वारा उपलब्ध होगी? कलिकाल में जब मनुष्य पाप कर्म में लिप्त हो, वेद-शास्त्र से विमुख रहेंगे दीनजन अनेक कष्टों से त्रस्त रहेंगे हे मुनिश्रेष्ठ! कलिकाल में सत्कर्मं में किसी की रुचि होगी, पुण्य क्षीण हो जाएंगे एवं मनुष्य स्वतः ही असत् कर्मों की ओर प्रेरित होगा इस पृथ्वी पर तब ज्ञानी मनुष्य का यह कर्तव्य हो जाएगा कि वह पथ से विचलित मनुष्य का मार्गदर्शन करे, अतः हे महामुने! ऐसा कौन-सा उत्तम व्रत है जिसे करने से मनवांछित फल की प्राप्ति हो और कलिकाल के पाप शान्त हो जाएं?”

सूत जी बोले- "हे शौनकादि ऋषिगण! आप धन्यवाद के पात्र हैं आपके विचार प्रशंसनीय जनकल्याणकारी हैं आपके ह्रदय में सदा परहित की भावना रहती है, आप धन्य हैं हे शौनकादि ऋषिगण! मैं उस व्रत का वर्णन करने जा रहा हूं जिसे करने से सब पाप और कष्ट नष्ट हो जाते हैं तथा जो धन वृद्धिकारक, सुख प्रदायक, सन्तान मनवांछित फल प्रदान करने वाला है इसे भगवान शंकर ने सती जी को सुनाया था।

सूत जी आगे बोले- "आयु वृद्धि स्वास्थ्य लाभ हेतु रवि त्रयोदशी प्रदोष का व्रत करें इसमें प्रातः स्नान कर निराहार रहकर शिव जी का मनन करें

मन्दिर जाकर शिव आराधना करें माथे पर त्रिपुण धारण कर बेल, धूप, दीप, अक्षत ऋतु फल अर्पित करें रुद्राक्ष की माला से सामर्थ्यानुसार, नमः शिवायजपे ब्राह्मण को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें, तत्पश्चात मौन व्रत धारण करें संभव हो तो यज्ञ-हवन कराएं ह्रीं क्लीं नमः शिवाय स्वाहामंत्र से यज्ञ-स्तुति दें इससे अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है प्रदोष व्रत में व्रती एक बार भोजन करे और पृथ्वी पर शयन करे इससे सर्व कार्य सिद्ध होते हैं श्रावण मास में इस व्रत का विशेष महत्व है सभी मनोरथ इस व्रत को करने से पूर्ण होते है हे ऋषिगण! यह प्रदोष व्रत जिसका वृत्तांत मैंने सुनाया, किसी समय शंकर भगवान ने सती जी को और वेदव्यास मुनि ने मुझे सुनाया था शौनकादि ऋषि बोले – "हे पूज्यवर! यह व्रत परम् गोपनीय, मंगलदायक और कष्ट हरता कहा गया है कृपया बताएं कि यह व्रत किसने किया और उसे इससे क्या फल प्राप्त हुआ?”