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समवेद उपकर्मा on 01 Sep 2019 (Sunday)

समवेद उपकर्मा संस्कृत के शब्द है जिनका आश्य है शुरुआत या किसी कार्य का आंरभ करना।  

साम वेद उपकर्मा एक बहुत ही मह्त्वपूर्ण और वैदिक अनुष्ठान है। यह आज के समय में भी ब्राह्मण जाति के हिंदुओं के बीच काफी ज्यादा प्रचलित है। 

क्या है समवेद उपकर्मा का अर्थ -

इस विशेष दिन से ही वेद विद्या को  सीखने का सही समय माना जाता है। और यही वह शुभ दिन है है जब ब्रह्माणों द्वारा पहने जाने वाले पवित्र धागे यानि की जनेऊ को बदला जाता है। यह धागा ब्रह्माण जाति का प्रतीक भी माना जाता है और इसे काफी पवित्र भी माना जाता है। इस विशेष धागे को साल में सिर्फ एक बार ही बदला जाता है।

कब मनायी जाती है समवेद उपकर्मा

समवेद उपकर्मा हर साल श्रावण मास के दौरान सिर्फ एक बार ही मनायी जाता है।  इस त्यौहार को तमिलनाडु में अवनी अवित्तम के नाम से भी जाना जाता है।  और इसके अगले दिन को कोगायत्रीगिरी जपम के नाम से जाना जाता है। 

यहां यह बताना बहुत ही आवश्यक है कि साम वेद उपकर्मा की प्रक्रिया दो अन्य वेदों ऋग और यजुर वेद उपकर्मा से पूरी तरह से अलग है। और इस विशेष प्रक्रिया का हमेशा कन्या मास के हस्त नक्षत्रपर पालन किया जाता है और इसमें निम्नलिखित 10 चरण होते हैं जैसे –

  •  पंचगव्य समामेलनम्
  • स्नाना महासंकल्पम्
  • ब्रह्मयज्ञम्
  • पुण्यम्
  • ऋषिपुजा (उष्टार्जन कर्म)
  • देव, ऋषिपिथ्रू थारपनम
  • घाट पूजै
  • यज्ञोपवीतधराणाम्
  • वेदारंभम
  • कंकणधरम्

आज का जीवन और समवेद उपकर्मा –

यूं तो प्राचीन समय में शास्त्रों के अनुसार इन 10 व्यापक चरणों का पूरी श्रद्धा व नियम के साथ पालन करने की आवश्यकता होती हैलेकिन आज समय बदल चुका है । हम सभी के पास समय की काफी कमी है। आज की इतनी सारी भाग दौड़ भारी जिंदगी में पूरी लगन के साथ सभी चरणों की प्रक्रियाओं को पूरा करना काफी मुश्किल हो गया है। और इसी कारण पूरी प्रक्रिया को इन दिनों निम्नलिखित चरणों में संक्षिप्त रुप से किया जाने लगा है –

  • स्नाना मह समक्ल्पम्
  • ब्रह्म यज्ञम्
  • यज्ञोपवीतं धरणम्

 

आइये जानते है इनकी संक्षिप्त प्रक्रिया विस्तार से –

स्नाना मह समक्ल्पम्- इस प्रक्रिया के दौरान महा संकलपम के लिए आपके सबसे पहले आचमन करने  की आवश्यकता है। उसके बाद पविथ्रम पहनना आवश्यक माना गया है।उसके बाद शुक्लाम बद्राराम और ओम बहो का जाप करें। और आखिर मे महाकालमपाम करें और फिर महासमलम् मंत्र का जाप करें। इस तरह स्नान करने के बाद आपके नये कपड़े पहनने है। उसके बाद दैनिक अनुष्ठानों का पूरे नियमों के साथ पालन करें। और सबसे आखिर में ब्रह्म यज्ञकरना चाहिए।

ब्रह्म यज्ञम् ब्रह्म यज्ञम करने के लिए आपको सबसे पहले आचमन करना चाहिए और उसके बाद अपना मुख पूर्व की दिशा की ओर करते हुये अपना स्थान ग्रहण करें।उसके बाद ईश्वर को प्राणायाम ओम का उच्चारण करें। इसके बाद अपने हाथों को पानी से धो ले और फिर ओम भोरबावसुव का जाप करें। अब अपने सिर के चारों ओर गंगाजल का छिड़कऔर उसके बाद सथ्यम थापा श्रीधाम जूहोमि का पाठ आंरभ करें। पाठ की समाप्ति होने पर हाथ जोड़ कर इस मंत्र का जाप तीन बार करें –

ओम नमो ब्राह्मणे नमोस्तुतेग्निवे।

इसके बाद देव तर्पण हाथ की पहली उंगली से करें।

यज्ञोपवीतं धरणम्-इस प्रक्रिया में पूनल को पहनकर  दोनों हाथों को जोड़कर अपना स्थाना ग्रहण करें।अब आचमन करते हुये अपनी पुरानी पूनल को उतारकर इसे एक-एक करके तोड़ना चाहिए। और इसके बाद दोबारा आचमन करना चाहिए। गायत्री जपम अब भक्त द्वारा किया जाना चाहिए और समारोह अभयदाय के साथ समाप्तकरना चाहिये।

कैसे करें प्रसाद तैयार –

प्रसाद के रूप में इस दिन सतवाडा हित्तु भक्तों के बीज बांटा जाता है जोकि चार तरह के फलमेवेदूधसफेद तिलशुद्ध देसी घीचावल का आटा  गुड डाल कर बनाया जाता है।