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वैकुण्ठ चतुर्दशी on 10 Nov 2019 (Sunday)

महत्व :-
एक बार देवऋषि नारद जी भगवान श्रीहरि यानी विष्णु से सरल भक्ति कर मुक्ति पा सकने का मार्ग पूछते हैं। नारद जी के कथन सुनकर श्री विष्णु जी कहते हैं कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को जो भी बैकुण्ठ चतुर्दशी व्रत का पालन करते हैं। उनके लिए स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं। भगवान विष्णु कहते हैं कि इस दिन जो भी भक्त मेरा पूजन करता है वह बैकुण्ठ धाम को प्राप्त करता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन बैकुण्ठ लोक के द्वार खुले रहते हैं।

कब और क्यों मनाई जाती है:-
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। यह पर्व भगवान शिव और भगवान विष्णु के एकाकार स्वरूप को समर्पि है। देवप्रबोधिनी एकादशी पर भगवान विष्णु चार माह की नींद से जागते हैं और चतुर्दशी तिथि पर भगवान शिव की पूजा करते हैं। इस तिथि पर जो भी मनुष्य हरि अर्थात भगवान विष्णु और हर अर्थात भगवान शिव की पूजा करता है, उसे बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है। ऐसा वरदान स्वयं भगवान विष्णु ने नारद जी के माध्यम से मानवजन को दिया था। इसीलिए इस दिन को बैकुंठ चतुर्दशी कहा जाता है। 

मान्यताए:-
ऐसी मान्यता है कि चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु सृष्टि का भार भगवान शंकर को सौंप देते हैं। कहा जाता है भगवन विष्णु ही संसार में सभी मांगलिक कार्य करवाते है लेकिन चार महीने की योगनिद्रा में चले जाते है। इसलिए चार महीने में मांगलिक कार्य नहीं होते है। इन चार दिनों में भगवन शिव सारा कार्यभार सँभालते है। इस प्रकार जब भगवन विष्णु योगनिद्रा से उठते है तोह भगवन शिव इन्हे स|रे कार्य सौप देते है। उसी दिन को वैकुण्ठ चतुर्दशी कहा जाता है।

विधि:-
  • इस दिन उज्जैन में भव्य यात्रा निकली जाती है जिसमे ढोल नगर जाते है। लोग नाचते हुए आतिश बजी के साथ महाकाल मंदिर जाकर बाबा के दर्शन करते है।
  • इस दिन भगवन विष्णु की पूजा की जाती है। विष्णु शहस्त्रा का पाठ किया जाता है। 
  • विष्णु मंदिर में कई तरह के आयोजन होते है।
  • इस दिन पवित्र नदियों में स्नान किया जाता है। इससे सभी पापो का नाश होता है। 
  • विष्णु जी योग निद्रा से जागते है इसलिए उत्सव मनाया जाता है। 
  • दीप दान किया जाता है।
  • इस दिन उपवास रखा जाता है।
कथा:-
एक बार भगवन विष्णु देवाधिदेव महादेव का पूजन करने के लिए काशी आए। यहां मणिकर्णिका घाट पर स्नान करके उन्होंने एक हजार स्वर्ण कमल पुष्पों से भगवान् विश्वनाथ के पूजन का संकल्प लिया। अभिषेक के बाद जब वे पूजन करने लगे तो शिव जी ने उनकी भक्ति की परीक्षा के उद्देश्य से एक कमल पुष्प कम कर दिया। भगवान श्रीहरि को अपने संकल्प की पूर्ति के लिए एक हजार पुष्प चढ़ाने थे। एक पुष्प की कमी देखकर उन्होंने सोचा मेरी आँखे कमल के ही समान हैं, इसलिए मुझे 'कमलनयन' और 'पुण्डरीकाक्ष' कहा जाता है। एक कमल के स्थान पर मैं अपनी आँख ही चढ़ा देता हूँ- ऐसा सोचकर वे अपनी कमल सदृश आँख चढ़ाने को उद्यत हो गये।