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वरूणी पर्व on 02 Apr 2019 (Tuesday)

वारूणी पर्व का महत्व

भारत की पुण्य भूमि जो आदि काल से ईष्वर की अन्नत सत्ता से जन मानस को अनुभूति कराते हुए जीवन के सत्य जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि के चक्र से मुक्ति पाने के साधन कहें हैं। जिसमे सर्व साधारण गृहस्थी व्यक्ति भी व्रत पर्व के सुअवसर के समय उनका पालन कर इस नाना दुःख रूपी संसार से व्यक्ति सभी सुखों को भोगते हुए अपने संसारिक कार्यो को करते हुए अंतिम लक्ष्य मोक्ष को सहज ही प्राप्त कर लेता है। ऐसी पवित्र भूमि में जन्म लेने का गौरव लाखों जन्मों के पुण्य के संचय के बाद ही मनुष्यों को मिलता है। देवता यह गीत गाते हैं कि जीव स्वर्ग और मोक्ष के हेतु मनुष्य रूप में उत्पन्न होते हैं और जो निष्काम कर्मानुष्ठान करते हुए उसे श्रीहरि विष्णु को समर्पित कर देते हैं वे धन्य हैं। जो इस ष्लोक से स्पष्ट है-
गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते भवन्ति  भूयः पुरूषा मनुष्याः।।

अथातर्् जीवन को सुखद बनाने तथा परम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करने के जो अनेकानेक साधन वेद ग्रंथों मे कहे गए हैं उनके करने से व्यक्ति निष्चिय ही जन्म-मृत्यु, दुख, भय, अज्ञान, अंधकार के बंधन से मुक्त हो जाता है। जिसमें नाना प्रकार व्रत पर्व उत्सव आदि का वर्णन आता है।
 
कई व्रत पर्व, ग्रहण, गंगा, स्नान, माघ स्नान, कुम्भ स्नान, संक्रांति आदि है जो साधरण पर्व से अच्छा फल देते या उनसे बढ़कर या कई बार उनके तुल्य फल देने और पाप दुःखों को नष्ट करने की क्षमता रखते हैं। इस पर्व का लाभ उठाते हुए अनेक भक्त श्रद्धालु लाभान्वित होंगे।  
 
वारूणी पर्व भी एक ऐसा पर्व है जिसमें स्नान, दान, हवन, यज्ञ करने से कई गुना बढ़कर फल प्राप्त होते हैं। इस पर्व का महत्व बनाते हुए कहा गया कि यह सूर्य ग्रहण के समान फल देने वाला है।

वारूणी पर्व का महायोग तीन प्रकार का होता है। जिसमे पहला चैत्र कृष्ण त्रयोदषी को होता है। यह (षतभिषा) नक्षत्र के होने से होता है। दूसरा उसी दिन षतभिषा और षनिवार हो तो वारूणी पर्व का महायोग आता है। तीसरा षतभिषा, षनिवार और षुभ योग हो तो महावारूणी बनता है। यह योग ऐसा योग है जो अपने पुण्य प्रभाव से सूर्य ग्रहण के समान फल देने वाला होता है। इस योग में व्रत, उपवास हवन, यज्ञ, दान, जप, स्नान जैसे- तीर्थज्ञस्थानों मे स्नान, दान आदि करने का बहुत अच्छा पुण्यफल प्राप्त होता है।