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योगिनी एकादशी on 28 Jun 2019 (Friday)

योगिनी एकादशी व्रत बढ़ाए समृद्धि
जीवन को धन्य बनाने उसे अहंकार, अज्ञानता, आशक्ति के अंधेरों से दूर रखने हेतु तथा सुख शांति व समृद्धि की ओर निरन्तर बढ़ने हेतु भारत की इस तपोभूमि व वनोभूमि में यज्ञों की वेदी सदियों से सजी रही है। सत्य सनातन हिन्दू धर्म जो त्याग, बलिदान, परोपकार, व विनम्रता तथा मर्यादाओं द्वारा धर्म व सत्य का रक्षक है धर्म व व्रत के अनुसरण से  सहज, सुखद दीर्घकालिक, चिरस्थाई, पवित्र, उत्तम गुणों मे वृद्धि होती है जिससे कर्मबंधन के चैरासी लाख योनि द्वार में भटकते हुए जीव का उद्धार होता है। उसका साक्षात्कार परम शक्ति से हो जाता है, उसे आवागम (जन्म-मृत्यु) के बंधनों से मुक्ति मिल जाती है। व्रत पर्व, धर्म व नेक कार्यों से उसके मन की मलीनता, राग, द्वेश, पीड़ाएं उसी प्रकार समाप्त हो जाती हैं जैसे-सूर्य की एक किरण के आते ही घने तिमिर का अंत हो जाता है और उस तेज व दिव्य प्रकाश से कमलदल मुस्कुराते हुए खिल उठते हैं व एक सुनहरी सुबह का आगाज हो जाता है। अर्थात् एकादशी का व्रत सम्पूर्ण पापों का नाशकर व्रती के जीवन को कमलदल की तरह खिला देता है। एकादशी को व्रतों मे व्रतराज कहा जाए तो कोई अतिषयोक्ति नहीं होगी। जिस प्रकार छः ऋतुआंें मे वसंत को ऋतुराज कहते हैं, उसी प्रकार एकादशी व्रत को व्रतराज भी कहते हैं।

व्रत व धर्म के प्रति जिज्ञासु महान धनुर्धर अर्जुन भगवान जनार्दन की निकटता पाकर आषाढ़ मास के एकादशी के विषय में पूछते है कि प्रभो कृपा करके आषाढ़ मास की एकादशी के विषय में बताइए इसका क्या नाम है और यह किस प्रकार के फल व्रती को प्रदान करता है ?

भक्तिपूर्ण जिज्ञासा को समझते हुए भगवान श्रीकृष्ण बोले हे कुन्तीनंदन! आपकी जिज्ञासा व भक्ति लोकहितार्थ बड़ी ही श्रेष्ठ है इसलिए सुनो आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम योगिनी एकादशी है। इस एकादशी का पुण्य प्रभाव श्रद्धा विष्वास के साथ व्रत का अनुसरण करने वाले व्रती के सभी पापों का अंत कर देता है तथा व्यक्ति को मनोवांछित फल प्राप्त होते है और यहां के सुखों को भोगते हुए अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है। एकादशी का व्रत तीनो लोकों मे प्रसिद्ध है। इस व्रत में  सदाचार, दया, क्षमा, सहिष्णुता, त्याग होना चाहिए।

इस व्रत की संक्षिप्त कथा इस प्रकार है प्राचीन काल में अन्नत अविनाशी शमशान सेवी भगवान षिव जो कृपा व दया के सागर है उनका भक्त जो कि अलकापुरी में राज्य करता था उसका नाम कुबेर था और नित्यप्रति भगवान षिव की पूजा किया करता था उसकी पूजा के लिए एक हेममाली पुष्प लाया करता था। किन्तु एकदा वह अत्यंत रूपवती अपनी स्त्री के साथ कामासक्त होकर पूजाकाल में रमण करने लगा। इधर शिव भक्त राजा उसका सुबह से दोपहर तक इंतजार करता रहा किन्तु वह नहीं पहुंचा इस पर राजा के अनुचरों ने उसका पता लगाया जिससे ज्ञात हुआ कि वह काम क्रियाओं मे अपनी स्त्री के साथ लिप्त है इस पर राजा क्रोधित हुआ और उसे अपने पास बुलाया और कहा तूने भगवान महेष्वर की पूजा में विध्नडाला है जो देवों के भी देव महादेव है इसलिए इस नीच कर्म की सजा हेतु मै तुझे श्रापित करता हूँ कि तू मृत्यु लोक में स्त्री का वियोग और कोढ़ से पीड़ित हो पृथ्वी पर भटकेगा।

इस प्रकार राजा के श्राप के द्वारा वह माली नाना प्रकार के कष्टों से पीड़ित वन में भटकने लगा और व्यथा पूर्ण उसका समय व्यतीत हुआ किन्तु कुछ काल के पष्चात् वह मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम जा पहुंचा जो महान तेजस्वी और दयालु ऋषि थे उसने अपनी सारी कथा उस तेजोराषि ऋषि से कह सुनाई तथा अपने उद्धार का उपाय पूछने लगा इस पर ऋषि ने उसे आषाढ़ मास की एकादशी का व्रत विधि पूर्ण करने को कहा ऋषि के ऐसे वचन सुनकर उसने विधि पूर्वक व्रत का पालन किया जिसके पुण्य प्रभाव से वह पुनः उसी सुन्दर काया में अपनी रूपवती स्त्री आदि वैभव को प्राप्त किया। इस एकादशी के व्रत में ब्राह्मणों को आदर सहित श्रद्धा विष्वास पूर्ण भोजन कराने का विधान है जिससे व्रती का व्रत सफल होता है और उसको धर्म मोक्ष स्वर्ण आदि प्राप्त होते है।

यह व्रत श्री हरि विष्णु को समर्पित है। अर्थात् नियम व संयम जो व्रत के प्रमुख घटक हैं उनका पालन बहुत ही जरूरी है अन्यथा व्रत का कोई फल नहीं प्राप्त होता और व्रती अविष्वास और अश्रद्धा का षिकार होकर नाना प्रकार के दुःखों से पीेड़ित होता रहता है। एकादशी व्रत अत्यंत दुर्लभ और पुण्यदायक व्रत है।