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महाविद्या छठा स्वारूप - माँ छिन्नमस्ता| on 17 Feb 2021 (Wednesday)

गुप्त नवरात्री में माँ छिन्नमस्ता की पूजा का महत्व -


गुप्त नवरात्री के नौ दिनों में माता के नौ रूपों के साथ साथ दस महाविद्याओं की पूजा की जाती है. इन दस महाविद्याओं में छठा स्वारूप महाविद्या है माँ छिन्नमस्ता….मां छिन्नमस्तिका की उपासना करने से भौतिक वैभव की प्राप्ति, वाद विवाद में विजय, शत्रुओं पर जय, सम्मोहन शक्ति के साथ-साथ अलौकिक सम्पदाएं भी प्राप्त होती हैं. इस पविवर्तन शील जगत की शक्ति  माँ छिन्नमस्ता को माना जाता है. माँ छिन्नमस्ता बहुत ही दयालु हैं. अगर कोई भक्त सच्चे हृदय से माँ छिन्नमस्ता की उपासना करता है तो ये अपने भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूरा करती हैं.


माँ छिन्नमस्ता का स्वरूप-

• माँ छिन्नमस्ता का सिर कटा हुआ

• इनके कबंध से हमेशा रक्त की तीन धाराएं निकलती रहती है

• माँ छिन्नमस्ता के तीन नेत्र हैं

• माँ हमेशा मदन और रति पर आसीन रहती है

• माँ छिन्नमस्ता अपने गले में हड्डियों की माला और कंधे पर यज्ञोपवीत धारण करती है

माँ छिन्नमस्ता की पूजा के लाभ -

• अगर कोई भक्त शांत भाव से इनकी उपासना करता है तो यह उसके सामने अपने शांत स्वरूप को प्रकट करती हैं

• अगर कोई भक्त उनके उग्र रूप की उपासना करता है तो ये अपने भक्त को उग्र रूप में दर्शन देती हैं. जिससे उपासक के उच्चाटन होने का डर रहता है.

• माता छिन्नमस्ता का स्वरूप बहुत ही गोपनीय होता है

• गुप्त नवरात्री के चौथे संध्याकाल में मां छिन्नमस्ता की उपासना करने से साधक को माँ सरस्वती की सिद्ध प्राप्त हो जाती है

• कृष्ण और रक्त गुणों संपन्न देवियां माँ छिन्नमस्ता की सहचरी हैं

• माँ छिन्नमस्ता की उपासना में पलास और बेलपत्रों का उपयोग करके छिन्नमस्ता महाविद्या की सिद्धि की जाती है

• माँ छिन्नमस्ता से प्राप्त सिद्धियां मिलने से मनुष्य के लेखन बुद्धि ज्ञान में बढ़ोत्तरी होती है

• गुप्त नवरात्री में माँ छिन्नमस्ता की उपासना करने से शरीर रोग मुक्त हो जाता हैं. इसके अलावा माँ छिन्नमस्ता की उपासना करने से सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष शत्रु परास्त हो जाते हैं.

• गुप्त नवरात्री में श्रद्धा पूर्वक माँ छिन्नमस्ता की पूजा करने से मनुष्य योग, ध्यान और शास्त्रार्थ में पारंगत होकर विख्यात हो जाता है.

गुप्त नवरात्री के चौथे दिन ऐसे करें माँ छिन्नमस्ता की पूजा-

• महाविद्या माँ छिन्नमस्ता की साधना करने वाले उपासक को सबसे पहले स्नान करने के पश्चात् शुद्ध काले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए

• अब अपने घर के किसी एकान्त स्थान या पूजा के कमरे में दक्षिण दिशा की तरफ़ मुख करके बैठ जाये.

• पूजा में बैठने के लिए हमेशा काले रंग के ऊनी आसन का इस्तेमाल करें

• अब अपने अपने सामने एक लकड़ी की चौकी रखें. अब चौकी पर गंगाजल छिड़ककर उसे शुद्ध कर लें.

• अब चौकी पर  काले रंग का कपड़ा बिछाएं.  

• अब चौकी पर प्राण प्रतिष्ठित सिद्ध छिन्नमस्ता यंत्र और माता के चित्र की स्थापना करे.

• अब माँ छिन्नमस्ता को कुंकुंम, पुष्प और अक्षत अर्पित करें.

• अब माँ की तस्वीर के सामने घी का दीपक जलाएं और लोबान धुप लगाकर श्रद्धा पूर्वक पूजा करें

• अब नीचे दिए गए मन्त्र का ध्यान पूर्वक जाप करें 

श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट् स्वाहा ‘ 

माँ छिन्नमस्ता की पूजा में ध्यान रखे ये बातें-

• माँ छिन्नमस्ता की पूजा हमेशा रात्रि 10 बजे के बाद ही आरम्भ करनी चाहिए और सुबह 3-4 बजे तक पूर्ण हो जानी चाहिए.

• माँ छिन्नमस्ता के मन्त्र का जाप करने के लिए हमेशा काले हकीक की माला का प्रयोग करें.