Banner 1
Banner 2

हयग्रीव जयंती on 03 Aug 2020 (Monday)

जानिए कैसे मनाई जाती है हयग्रीव जयंती 

क्या है हयग्रीव जयंती -

हयाग्रीव जयंती के दिन भगवान हयग्रीव की पूजा की जाती है. हयग्रीव भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से एक है. जब राक्षसों ने वेदो और ब्रम्हा जी को बंधक बना लिया था तब भगवान् हयग्रीव ने अपने इस अवतार में वेदों और ब्रह्मा को पुनर्स्थापित किया था, भगवान हयग्रीव को ज्ञान और बुद्धि का देवता माना जाता है हयग्रीव जयंती पारंपरिक हिंदू कैलेंडर के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है.

हयग्रीव जयंती का महत्व:

भगवान् हयाग्रीव का सर घोड़े या हैया के समान है इसलिए, उन्हें हयाग्रीव के नाम से जाना जाता है. कई क्षेत्रों में, भगवान हयग्रीव संरक्षक देवता माना जाता हैं जिन्होंने बुराई को दूर करने के लिए अवतार धारण किया था. इस अवतार में घोड़े का सिर उच्च शिक्षा और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है. भगवान हयग्रीव का आशीर्वाद हमें अधिक से अधिक ऊंचाइयां प्राप्त करने में मदद करता है.

कथा-

हिंदू शास्त्रों के अनुसार, भगवान हयग्रीव के अवतार के विषय में दो किंवदंतियां मशहूर हैं. पहली किवदंती के अनुसार कश्यप प्रजापति के पुत्र हयग्रीव ने माँ दुर्गा की घोर और कठिन तपस्या की. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माँ दुर्गा ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान दिया कि कोई भी मनुष्य या भगवान उन्हें पराजित नहीं कर पाएंगे, और वह केवल हयाग्रीव से पराजित हो सकते हैं. बाद में हयाग्रीव ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया. पूरी दुनिया भर में चारों ओर उनकी दहशत फ़ैल गई. युद्ध के मैदान में, देवता हयाग्रीव को हराने में असमर्थ थे. यह देखकर भगवान विष्णु ने अपने धनुष पर अपना सिर टिका दिया. जब धनुष का तार टूट गया, तो भगवान विष्णु का सिर उनके धड़ से अलग हो गया. यह देखकर देवता भय से कांपने लगे, लेकिन केवल देवी दुर्गा ने इसका कारण समझा, उन्होंने ब्रह्मा से विष्णु के शरीर के लिए एक घोड़े के सिर को संलग्न करने के लिए कहा. इस प्रकार एक और हयाग्रीव का निर्माण किया गया जो युद्ध में गया और उसने राक्षस हयाग्रीव को परास्त किया.

एक अन्य किंवदंती के अनुसार भगवान हयग्रीव ने वेदों को पुनर्प्राप्त करने के लिए एक एक घोड़े का अवतार लिया, वेद जिन्हे मधु और कैटभ नाम के दो असुरों ने चुराकर गहरे पानी के नीचे रखा था. जब भगवान ब्रह्मा गहरी नींद में  सो रहे थे तब इन दो असुरों ने वेदो को चुरा लिया था. भगवान विष्णु ने वेदों  बचाने के लिए इस अवतार को धारण किया.इसलिए, हयग्रीव अवतार ज्ञान और ज्ञान से जुड़ा हुआ माना जाता है.

भगवान् हयग्रीव का स्वरुप -

भगवान हयग्रीव को भगवान विष्णु के रूप में चित्रित किया गया है, जिसमें मानव के शरीर और घोड़े का सिर, सफेद रंग, सफेद पोशाक पहने और एक सफेद कमल पर बैठे हुए हैं. अवनि अवित्तम का पर्व भी हयग्रीव जयंती के दिन मनाया जाता है. यह एक ऐसा अवसर है जब पुराने यज्ञोपवीत; जिसे जनेऊ के नाम से जाना जाता है उसे बदल कर नया जनेऊ धारण किया जाता है. इस दिन भगवान ब्रह्मा की भी पूजा की जाती है. छात्र ज्ञान और ज्ञान प्राप्त करने के लिए आशीर्वाद के लिए भगवान हयग्रीव की पूजा करते हैं. इस दिन असम में भगवान हयग्रीव मंदिर और नांगनल्लूर चेन्नई में हयाग्रीव मंदिर में भव्य उत्सव मनाया जाता है जिसे हयग्रीव माधव मंदिर के नाम से जाना जाता है.

हयग्रीव जयंती से जुडी विशेष बाते-

पवित्र ग्रंथों के अनुसार, राक्षसों से वेदों को पुनर्स्थापित करने के लिए विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लिया. हयाग्रीव पुनर्स्थापना के प्रतीक का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अज्ञान के चंगुल से ज्ञान को पुनर्स्थापित करते हैं. भगवान् विष्णु का यह अवतार उनके गुण,शक्ति,, वीरता, संयोग और धन के लिए उनके अन्य 10 अवतारों से अद्वितीय है. उन्हें एक घोड़े के चेहरे और एक मानव शरीर के साथ चित्रित किया गया है, और उनके 4 हाथ हैं, जिसमें वो 3 हाथ, एक शंख, और माला धारण किये हुए हैं, और उनका एक हाथ मुद्रा और अपार धन और ज्ञान प्रदान करता है.

भगवान् हयग्रीव पूजन विधि-

श्री हयग्रीव जी की पूजा करने के लिए सूर्योदय से पूर्व जागकर नित्यक्रियाओं से निवृत होने के पश्चात् स्नान करें स्नान करने के पश्चात् स्वच्छ