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पापांकुशा एकादशी on 16 Oct 2021 (Saturday)

पापांकुशा एकादशी

सब व्रतों में सर्वश्रेष्ठ व्रत है एकादशी का व्रत| एक साल में कुल चौबीस एकादशी होतीं हैं परन्तु अधिक मॉस में दो एकादशी और अजाने से कुल छबीस एकादशियाँ होजाती हैं|एकादशी एक मात्र ऐसा व्रत है जो मनुष्य के सब पापो का नाश कर उसकी बुद्धि को सत्मार्ग पर चलने के लिए दिशा देता है| मनुष्य को एकादशी के व्रत से मोक्ष की भी प्राप्ति होती है| एकादशी एक मात्र ऐसा व्रत है जिस से मनुष्य सभी देवी देवताओं को प्रसन्न कर उनकी कृपा पा लेता है|

आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पड़ने वाली एकादशी को "पापांकुशा एकादशी" कहते है| ऐसी मान्यता है की इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के जीवन में किये गए जाने अनजाने सारे पाप नष्ट होजाते है|

पापांकुशा एकादशी का महत्‍व मान्‍यताओं के अनुसार हजारों अश्वमेघ यज्ञों और सैकड़ों सूर्य यज्ञों के बाद भी इस व्रत का 16वां भाग जितना फल भी नहीं मिलता. मान्यताओं के अनुसार पुण्य की प्राप्ति होती है| इस एकादशी का व्रत करने से मैं व् आत्मा दोनों की शुद्धि होती है|ऐसा कहा जाता है की एकादशी व्रत के सामान अन्य कोई व्रत नहीं है|एकादशी की रात्रि की जागरण करने से मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति होती है|इस एकादशी पर विष्णु भगवान् के पद्मनाभ स्वरुप की पूजा की जाती है|

पापांकुशा व्रत व् पूजन विधि|

  1. एकादशी के दिन सूर्य उदय के पूर्व उठे और स्नान आदि कर खुद को शुद्ध करें|
  2. सबसे पहले भगवान् सूर्य को जल अर्पित करें|
  3. अब भगवान् के आगे हाथ जोड़ कर व्रत का संकल्प लें|
  4. अब एक चौकी लें उसपे पीला वस्त्र बिछाएं|
  5. चौकी पर भगवान् विष्णु जी की मूर्ति या चित्र इस्थापित करें|
  6. साथ में माँ लक्ष्मी जी की मूर्ति भी रखें|
  7. अब भगवान् को जल का छींटा दें|
  8. भगवान् को पीले वस्त्र अर्पित करें|
  9. उनको तिलक करें व् पीले फूल भी अर्पित करें|
  10. अब भगवान् की पूजा अर्चना करें|
  11. भगवान् के आगे धुप दीप भी लगाएं|
  12. संभव हो तो विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ करें अन्यथा बहगवां विष्णु के मन्त्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का क्षमता अनुसार जाप करें|
  13. पापांकुशा एकादशी की व्रत कथा भी अवश्य पढ़े|
  14. अब पूरा दिन व्रत करें इस व्रत की निर्जल व् फलाहार खा कर भी किया जा सकता है|

पापांकुशा व्रत कथा|

धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! आश्विन शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? अब आप कृपा करके इसकी विधि तथा फल कहिए। भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे युधिष्ठिर! पापों का नाश करने वाली इस एकादशी का नाम पापांकुशा एकादशी है। हे राजन! इस दिन मनुष्य को विधिपूर्वक भगवान पद्‍मनाभ की पूजा करनी चाहिए। यह एकादशी मनुष्य को मनवांछित फल देकर स्वर्ग को प्राप्त कराने वाली है।

मनुष्य को बहुत दिनों तक कठोर तपस्या से जो फल मिलता है, वह फल भगवान गरुड़ध्वज को नमस्कार करने से प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य अज्ञानवश अनेक पाप करते हैं परंतु हरि को नमस्कार करते हैं, वे नरक में नहीं जाते। विष्णु के नाम के कीर्तन मात्र से संसार के सब तीर्थों के पुण्य का फल मिल जाता है। जो मनुष्य शार्ङ्‍ग धनुषधारी भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं, उन्हें कभी भी यम यातना भोगनी नहीं पड़ती।
जो मनुष्य वैष्णव होकर शिव की और शैव होकर विष्णु की निंदा करते हैं, वे अवश्य नरकवासी होते हैं। सहस्रों वाजपेय और अश्वमेध यज्ञों से जो फल प्राप्त होता है, वह एकादशी के व्रत के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं होता है। संसार में एकादशी के बराबर कोई पुण्य नहीं। इसके बराबर पवित्र तीनों लोकों में कुछ भी नहीं। इस एकादशी के बराबर कोई व्रत नहीं। जब तक मनुष्य पद्‍मनाभ की एकादशी का व्रत नहीं करते हैं, तब तक उनकी देह में पाप वास कर सकते हैं।

हे राजेन्द्र! यह एकादशी स्वर्ग, मोक्ष, आरोग्यता, सुंदर स्त्री तथा अन्न और धन की देने वाली है। एकादशी के व्रत के बराबर गंगा, गया, काशी, कुरुक्षेत्र और पुष्कर भी पुण्यवान नहीं हैं। हरिवासर तथा एकादशी का व्रत करने और जागरण करने से सहज ही में मनुष्य विष्णु पद को प्राप्त होता है। हे युधिष्ठिर! इस व्रत के करने वाले दस पीढ़ी मातृ पक्ष, दस पीढ़ी पितृ पक्ष, दस पीढ़ी स्त्री पक्ष तथा दस पीढ़ी मित्र पक्ष का उद्धार कर देते हैं। वे दिव्य देह धारण कर चतुर्भुज रूप हो, पीतांबर पहने और हाथ में माला लेकर गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को जाते हैं।

हे नृपोत्तम! बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में इस व्रत को करने से पापी मनुष्य भी दुर्गति को प्राप्त न होकर सद्‍गति को प्राप्त होता है। आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की इस पापांकुशा एकादशी का व्रत जो मनुष्य करते हैं, वे अंत समय में हरिलोक को प्राप्त होते हैं तथा समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं। सोना, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, छतरी तथा जूती दान करने से मनुष्य यमराज को नहीं देखता।

जो मनुष्य किसी प्रकार के पुण्य कर्म किए बिना जीवन के दिन व्यतीत करता है, वह लोहार की भट्टी की तरह साँस लेता हुआ निर्जीव के समान ही है। निर्धन मनुष्यों को भी अपनी शक्ति के अनुसार दान करना चाहिए तथा धनवालों को सरोवर, बाग, मकान आदि बनवाकर दान करना चाहिए। ऐसे मनुष्यों को यम का द्वार नहीं देखना पड़ता तथा संसार में दीर्घायु होकर धनाढ्‍य, कुलीन और रोगरहित रहते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- हे राजन! जो आपने मुझसे मुझसे पूछा वह सब मैंने आपको बतलाया। अब आपकी और क्या सुनने की इच्छा है?