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सूक्ष्म आत्माओं को प्रसन्न करने के लिए करें तर्पण

दुनिया में अलग अलग संप्रदायों के लोग किसी न किसी प्रकार से श्राद्ध की प्रक्रिया निभाते हैं. परंतु हिंदू धर्म में श्राद्ध की प्रक्रिया बहुत ज्यादा गहरी है. ऐसा माना जाता है कि मृत्यु के पश्चात मृत आत्माएं अपने परिवार और जगह के साथ लंबे समय तक बनी रहते हैं. जिसका आभास हमें अलग-अलग तरह से होता रहता  है. श्राद्ध करने से इन सूक्ष्म आत्माओं को मोह माया से मुक्ति मिलती है. इसके अलावा इन आत्माओं के प्रति हमारी श्रद्धा भी व्यक्त होती है. 

श्राद्ध के प्रकार :-
  • मत्स्य पुराण के अनुसार श्राद्ध तीन प्रकार के बताए गए हैं. नित्य श्राद्ध, नैमित्तिक श्राद्ध और काम्य श्राद्ध.   इसके अलावा ब्रह्मपुराण में पांच प्रकार के श्राद्ध बताए गए हैं. इन्हें नित्य ,नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि और पावार्थ  श्राद्ध के नाम से जाना जाता है. 
  • जो श्राद्ध नियमित रूप से किए जाते हैं और केवल जल से संपन्न किए जाते हैं उन्हें नित्य श्राद्ध कहा जाता है. जो श्राद्ध पितृपक्ष अमावस्या अथवा पुण्यतिथि पर किया जाता है उसे पावर्थ  श्राद्ध कहते हैं. 
  • विश्वामित्र स्मृति और भविष्य पुराण में 12 प्रकार के श्राद्ध का विवरण दिया गया है. यह सभी पांच प्रकार के अलावा सपिण्डन गोष्टी, शुद्धयर्थ कर्मांग, दैविक यात्रार्थ और पुष्टिर्थ है. 
  • नैमित्तिक श्राद्ध किसी के नाम से किया जाता है. ये श्राद्ध दशाह एकदशा एकोदिष्ट  के अंतर्गत आते हैं. काम्य श्राद्ध किसी मनोकामना को पूरा करने के लिए किया जाता है और वृद्धि शास्त्र पुत्र प्राप्ति, विवाह और मांगलिक कार्य के लिए किया जाता है. इसे नांदी श्राद्ध भी कहा जाता है. 
  • सपिण्डन श्राद्ध में पिंडों को मिलाने का नियम है.  मृत्यु के पश्चात व्यक्ति प्रेत योनि में चला जाता है. प्रेत योनि से पितर अवस्था में पहुंचाने के लिए श्राद्ध कर्म किया जाता है. 
  • जो श्राद्ध सामूहिक रुप से संपन्न किया जाता है उसे गोष्ठी श्राद्ध और शुद्धि श्राद्ध कहा जाता है. किसी खास कर्म के अंग के रूप में किए जाने वाले श्राद्ध  कर्मांग श्राद्ध कहते हैं.  
  • पित्र पक्ष की 16 तिथियों में मृत लोगों की पुण्यतिथि, पित्र पूजन पर ब्राह्मण भोजन और अन्न वस्त्र आदि दान करने का नियम है. ऐसा करने से मृत आत्माएं प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं. 
  • जो लोग पितरों को पिंडदान करते हैं उनके पितर उन्हें सुखद गृहस्थ जीवन, दीर्घायु,  पुत्र, पौत्र, यश, बल, धन और लक्ष्मी का आशीर्वाद देते हैं. 
श्राद्ध कर्म से जुडी खास बाते :-
  • श्राद्ध वाले दिन किसी भी प्रकार का नशा नहीं करना चाहिए. इसके अलावा हमेशा दक्षिण की तरफ मुख करके श्राद्ध की सभी प्रक्रियाओं को पूरा करना चाहिए. 
  • श्राद्ध करने का अधिकार जेष्ठ पुत्र को प्राप्त होता है. अगर मृतक व्यक्ति के पुत्र अलग अलग रहते हैं तो उन्हें अलग अलग श्राद्ध करना चाहिए. 
  • 6 वर्ष से अधिक आयु वाले मृतक व्यक्ति का श्राद्ध किया जा सकता है. यदि पितर पक्ष में विधिपूर्वक श्राद्ध की प्रक्रिया की जाए तो पितर पूरे साल प्रसन्न रहते हैं. जिससे हमारे जीवन में भी सुख और समृद्धि बनी रहती है. 
  • गरुण पुराण में बताया गया है कि मरने के बाद जीवात्मा अपने किए गए कर्मों का फल प्राप्त करती है.   पदम पुराण के अनुसार यदि कोई व्यक्ति संकल्प के साथ पूरी श्रद्धा से श्राद्ध करता है तो वह उसके पितरो को जरूर प्राप्त होता है. 
  • श्राद्ध पक्ष में सभी पितर श्राद्ध स्थल पर मौजूद रहते हैं और ब्राह्मणों के साथ हवा के रूप में भोजन ग्रहण करते हैं. 
  • अश्विन अमावस्या के दिन सभी पितृ अपने वंशजों के यहां आगमन करते हैं. अगर आप अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करते हैं तो आपको उनके आशीर्वाद की जगह उनका श्राप भी मिल सकता है. इसलिए श्राद्ध के दिन फूल, फल, जल, तर्पण आदि से पितरों का श्राद्ध करना आवश्यक होता है. 
  • श्रीमद्भागवत में बताया गया है कि महापुराण पढ़ने वाला, सुनने वाला व्यक्ति ज्ञानी होता है और उस व्यक्ति की 21 पीढ़ियां के पूर्वजों को मुक्ति मिल जाती है. 
  • कई बार परिवार में बिना किसी कारण के लड़ाई झगड़े होते रहते हैं. कोई भी काम समय पर पूरा नहीं होता है और मानसिक अशांति बनी रहती है. यह परिस्थिति पित्र दोष के कारण हो सकती है. 
  • हरिवंश पुराण में बताया गया है कि अमावस्या के दिन श्राद्ध करने से पितरों को मुक्ति मिलती है.  गरुड़ पुराण के अनुसार जैसे बारिश का पानी सीप में गिरने से मोती बनता है. कंजली में गिरने से कपूर और खेत में गिरने से अनाज उत्पन्न होता है वैसे ही तर्पण करने से सूक्ष्म आत्माएं तृप्त हो जाती हैं.