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प्रथम महाविद्या - माँ काली on 12 Feb 2021 (Friday)

गुप्त नवरात्रि के पहले दिन करें मां काली की पूजा

माघ मॉस में पड़ने वाली नवरात्री को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है. इस नवरात्री में मां दुर्गा  और उनकी दस महाविद्याओं की विशेष पूजा की जाती है. इस साल माघ मॉस में पड़ने वाली गुप्त नवरात्रि  शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से आरम्भ हो रही है. माघ मॉस में पड़ने वाली गुप्त नवरात्री को विशेष रूप से गुप्त साधानाओं के लिए जाना जाता है. गुप्त नवरात्री के पहले दिन मां काली की पूजा करने का नियम है

गुप्त नवरात्री में मां काली की पूजा का महत्व -

दस महाविद्याओं में माँ काली प्रथम रूप है. माँ काली जी का स्वरुप अत्यंत विकराल, अभंयकारी और मंगलकारी है. माँ काली का ये स्वरुप असुरों का नाश करने वाला है. यदि कोई व्यक्ति गुप्त नवरात्री के दौरान माँ काली की पूजा करता है तो उसके ऊपर सामने आसुरी शक्तियों का कोई असर नहीं होता हैं. माँ काली की पूजा करने वाले व्यक्ति को रूप, यश, जय की प्राप्ति होती है. समस्त सांसारिक बाधाएं खत्म हो जाती है.  माँ काली ने चंड-मुंड का संहार किया था इसलिए इन्हे चामुण्डा के नाम से भी जाना जाता है. माँ काली अपने गले मुंडमाला धारण करती हैं इनके एक हाथ में खड्ग दूसरे हाथ में त्रिशूल और तीसरे हाथ में कटा हुआ सिर होता है.  

मां दुर्गा ने रक्तबीज नाम के असुर का वध करने के लिए काली का अवतार धारण किया था. दस महाविद्याओं में माँ काली प्रथम देवी है. गुप्त नवरात्रि में प्रथम दिन माँ काली की आराधना की जाती है. जो लोग तंत्र शक्तियां प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें गुप्त नवरात्र के पहले दिन विशेष रूप से मां काली की पूजा करनी चाहिए. इसके अलावा मां काली की आराधना करने से सभी प्रकार की तंत्र बाधाओं से छुटकारा मिलता है. जो लोग अपने शत्रुओं से बहुत परेशान रहते है उन्हें गुप्त नवरात्रि में मां काली की आराधना  करनी चाहिए. ऐसा करने से शत्रु से मुक्ति मिलती है

माँ काली की पूजा करने से अकाल मृत्यु का भय भी दूर हो जाता है. गुप्त नवरात्रि में दो तरीकों से मां काली की पूजा की जाती है. जो लोग तांत्रिक विद्या हासिल करना चाहते हैं वह लोग इस दिन मां काली की तंत्र विद्या द्वारा उपासना करते हैं. कुछ लोग गुप्त नवरात्र के प्रथम दिन सामान्य तरीके से मां काली आराधना करते हैं. जिससे उनके जीवन के सभी संकट दूर हो जातें हैं

मां काली पूजन विधि

गुप्त नवरात्रि के पहले दिन सुबह ब्रम्ह मुहूर्त (सुबह 4 बजे) उठकर स्नान करने के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करें

• अब एक साफ चौकी पर गंगाजल छिड़क कर उसे शुद्ध कर लें. अब इस चौकी पर साफ कपड़ा बिछाकर  घट स्थापना करें

• घट स्थापना करने के लिए मिट्टी, तांबे या स्टील के पात्र में जल भरकर चौकी पर रखें. अब इसके ऊपर एक नारियल को मौली और चुन्नी से लपेट कर कलश के ऊपर स्थापित करें

• अब चौकी पर मां काली की प्रतिमा या मूर्ति की स्थापना करें. अब मां काली की तस्वीर को रोली का टीका लगाएं

 • तिलक करने के पश्चात मां काली को लाल पुष्पों की माला, पुष्प,फल, मिठाई, नैवेद्य आदि चढ़ाएं. और पुरे विधि विधान और श्रद्धा के साथ मां काली की पूजा करें

• अब मां काली के समक्ष सरसों के तेल या घी का दीपक प्रज्वलित करें. और श्रद्धा पूर्वक मां काली के मंत्रों का जाप करें.

देवी कवच, अर्गला स्तोत्र का पाठ करें. सबसे अंत में श्रीसूक्तम का पाठ करना चाहिए .

• जिस आसन पर आप बैठते हैं उसका रंग लाल होना चाहिए.

• अब  मां काली की कथा सुने या पढ़ें. इस दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करना भी बहुत उत्तम होता है

• माँ काली की कथा सुनने के पश्चात कपूर से आरती करें प्रसाद के रूप में मिठाई का भोग लगाएं

• यदि आपके पास मिठाई नहीं है तो आप मां काली को बताशे का प्रसाद भी चढ़ा सकते है

• अब सभी लोगों में प्रसाद बाँट दें.और फिर स्वंय भी प्रसाद ग्रहण करें. अब मां काली से पूजा में हुई किसी भी प्रकार की गलती के लिए हाथ जोड़ कर क्षमा मांगे.

मां काली के मंत्र 

ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै

मां काली की कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार दारुक नाम के राक्षस ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके उनसे वरदान प्राप्त कर देवताओं और ब्राह्मणों को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया और स्वर्गलोक पर कब्जा कर लिया। जिसके बाद सभी देवता भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने सभी देवताओं को बताया कि इस दुष्ट का संहार एक स्त्री ही कर सकती है। जिसके बाद सभी देवता भगवान शिव के पास गए और उन्होंने भगवान शिव को सभी बात बताई। 

जिसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती की और देखा। माता पार्वती इस पर मुस्कुराई और अपना एक अंश भगवान शिव में प्रवाहित कर दिया जिसके बाद भगवान शिव के कंठ से विष से उस अंश ने अपना आकार धारण किया।जिसके बाद भगवान शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। उनके इस नेत्र से विकराल रूप वाली मां काली उत्पन्न हुई।मां काली के लालट में तीसरा नेत्र और चन्द्र रेखा थी। मां काली के भयंकर विशाल रूप को देख देवता सिद्ध लोग भागने लगे। 

जिसके बाद मां काली का दारूक और उसकी सेना के साथ भंयकर युद्ध हुआ मां काली ने सभी का वध कर दिया। लेकिन मां काली का क्रोध शांत नहीं हुआ और मां काली के इस क्रोध से संसार भी जलने लगा। जिसके बाद भगवान शिव ने एक बालक रूप धारण किया और शमशान में लेट कर रोने लगे। जिसके बाद मां काली उन्हें देखकर मोहित हो गई। इसके बाद मां काली ने बालक रूपी भगवान शिव को अपने गले से लगाकर अपना दूध पिलाया। जिसके बाद उनका क्रोध भी शांत हो गया।

मां काली की आरती 

अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली

तेरे ही गुण गायें भारती, मैया हम सब उतारें तेरी आरती || 

तेरे भक्त जनों पे माता, भीर पड़ी है भारी

दानव दल पर टूट पडो माँ, करके सिंह सवारी || 

सौ सौ सिंहों से तु बलशाली, दस भुजाओं वाली

दुखिंयों के दुखडें निवारती, मैया हम सब उतारें तेरी आरती || 

माँ बेटे का है इस जग में, बड़ा ही निर्मल नाता

पूत कपूत सूने हैं पर, माता ना सुनी कुमाता || 

सब पर करुणा दरसाने वाली, अमृत बरसाने वाली || 

दुखियों के दुखडे निवारती, मैया हम सब उतारें तेरी आरती || 

नहीं मांगते धन और दौलत, चाँदी सोना

हम तो मांगे माँ तेरे मन में, इक छोटा सा कोना || 

सबकी बिगडी बनाने वाली, लाज बचाने वाली

सतियों के सत को संवारती, मैया हम सब उतारें तेरी आरती || 

अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली

तेरे ही गुण गायें भारती, मैया हम सब उतारें तेरी आरती ||