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वैभव लक्ष्मी व्रत | Vaibhav Lakshmi Vrat on 07 Feb 2025 (Friday)

जानिए वैभव लक्ष्मी व्रत की महिमा और खास पूजन विधि

वैभव लक्ष्मी व्रत का महत्व-

वैभव लक्ष्मी व्रत करने से मनुष्य के जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और कभी भी धन की कमी का सामना नहीं करना पड़ता है. वैभव लक्ष्मी का व्रत करने से आर्थिक संकटों से मुक्ति मिलती है और संतान से जुड़ी सभी समस्याओं का अंत होता है. अगर आप शुक्रवार के दिन मां वैभव लक्ष्मी का व्रत करते हैं तो आपका घर हमेशा धनधान्य से पूर्ण रहता हैजिन लोगों की कुंडली में शुक्र दोष होता है उन्हें भी मां लक्ष्मी वैभव लक्ष्मी का व्रत अवश्य करना चाहिए.

वैभव लक्ष्मी व्रत करने से जीवन में चल रही धन से जुड़ी समस्याओं का अंत होता है. अगर आप पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ वैभव लक्ष्मी का व्रत करते हैं तो आपके घर परिवार में मां लक्ष्मी का स्थिर रूप से निवास करती हैं. जो लोग व्यापार में लाभ पाना चाहते हैं उन्हें भी वैभव लक्ष्मी का व्रत अवश्य करना चाहिए. सुहागिन स्त्रियों के लिए वैभव लक्ष्मी का व्रत बहुत ही फलदाई होता है.

वैभव लक्ष्मी व्रत के नियम-

  •    इस व्रत को आरंभ करने के लिए प्रथम शुक्रवार के दिन अपनी क्षमता के अनुसार 7, 11 या 21 शुक्रवार व्रत करने का संकल्प लें और शास्त्रीय विधि के द्वारा वैभव लक्ष्मी का व्रत और पूजन करें.
  •  वैभव लक्ष्मी का व्रत और पूजन शुरू करने से पहले लक्ष्मी स्तवन का पाठ अवश्य करें.
  •  अपने घर के पूजा घर में श्री यंत्र की स्थापना करें. मां लक्ष्मी को श्री यंत्र अत्यंत प्रिय है.
  •  माँ लक्ष्मी की पूजा करने से पहले गणेश जी को प्रणाम क्र उनका ध्यान अवश्य करें| अन्यथा माँ लक्ष्मी पूजा स्वीकार नहीं करतीं|
  •  अगर आप व्रत करने में सक्षम है तो शुक्रवार के दिन पूरे दिन व्रत करें. यदि आप कमज़ोर या बीमार हैं या पूरा दिन व्रत नहीं रख सकते हैं तो दिन में एक बार फलाहार या भोजन करके भी इस व्रत को पूर्ण कर सकते हैं.
  •  मां वैभव लक्ष्मी की पूजा में लाल वस्तुओं का बहुत महत्व होता है. श्रद्धापूर्वकमां लक्ष्मी की पूजा करने के पश्चात भोग लगाएं और मां लक्ष्मी से घर की सुख और समृद्धि के लिए हाथ जोड़कर प्रार्थना करें.
  • हमारे धर्म पुराणों में बताया गया है कि वैभव लक्ष्मी मंत्र का श्रद्धापूर्वकजाप करने से घर के सभी आर्थिक संकट दूर हो जाते हैं.
  • मां वैभव लक्ष्मी की कृपा से आपका घर में हमेशा धन और सुख समृद्धि से परिपूर्ण रहता है.
  • अगर आप शुक्रवार के दिन किसी यात्रा पर गए हैं तो यह व्रत ना करें. आप अगले शुक्रवार को व्रत कर सकते हैं.
  • मान्यताओं के अनुसार वैभव लक्ष्मी का व्रत घर के बाहर किसी स्थान पर नहीं करना चाहिए.

वैभव लक्ष्मी पूजन विधि-

  •  वैभव लक्ष्मी मां का पूजन करने के लिए सबसे पहले स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहने.
  • अब पूरा दिन मन में मां लक्ष्मी के अलग अलग नामों का ध्यान करें.
  • संध्या काल में पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठे. अब अपने सम्मुख लकड़ी के पटरे पर लाल रंग का वस्त्र बिछाए.
  • अब पटरे पर चावल की छोटी सी ढेरी बनाएं और उसके ऊपर तांबे का जल से भरा हुआ कलश रखें.
  • अब कलश के ऊपर रखे पात्र में अपनी क्षमता अनुसार सोने चांदी के आभूषण या 1 का सिक्का रखें. कलश के सामने मां लक्ष्मी की तस्वीर और श्री यंत्र की स्थापना करें.
  • अब हल्दी, कुमकुम और चावल से मां लक्ष्मी, श्री यंत्र और कलश की पूजा करें कलश के ऊपर रखे आभूषण या सिक्के की भी पूजा करें.
  • इस बात का ध्यान रखे की पहले शुक्रवार के दिन आप कलश के ऊपर जो आभूषण या सिक्का रखते हैं उसी आभूषण या सिक्के को हर शुक्रवार के दिन कलश के ऊपर रखें.
  • अब कलश के ऊपर रखे आभूषण पर फूल अर्पित करें और मां लक्ष्मी को लाल रंग का फूल और माला चढ़ाएं.
  •  अब हाथ जोड़कर माँ लक्ष्मी के अष्ट रूपों का ध्यान करके सच्चे मन से प्रार्थना करें.

'हे मां धनलक्ष्मी! मैंने पूरी श्रद्धा और आस्था के आपका 'वैभवलक्ष्मी व्रत' करने का संकल्प लिया था. आज मैंने आपका यह पूर्ण किया है. हे माँ! मेरी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करें. हमारे जीवन में आने वाले सभी संकटों को दूर करें. हमारा कल्याण करेंहे माँ! आपके वैभव लक्ष्मी व्रत की महिमा अपार है।' आपकी जय हो! ऐसा कहकर माँ लक्ष्मी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' की छवि को पूरी श्रद्धा के साथ प्रणाम करें.

  • कथा पढ़ने के बाद घी के दीपक से माता की आरती करें.
  • आखरी शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी को खीर का भोग लगाएं. पूजा करने के पश्चात मां लक्ष्मी के सामने नारियल फोड़े और सात कुमारी कन्याओं या सुहागन स्त्रियों को कुमकुम का तिलक लगाकर उपहार स्वरूप मां वैभव लक्ष्मी व्रत कथा की पुस्तकें और अपनी क्षमता अनुसार धन या आभूषण प्रदान करें.

वैभव लक्ष्मी व्रत कथा-

किसी शहर में लाखों लोग रहते थे। सभी अपने-अपने कामों में रत रहते थे। किसी को किसी की परवाह नहीं थी। भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गए। शहर में बुराइयाँ बढ़ गई थीं। शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होते थे। इनके बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे।

ऐसे ही लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी। शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी स्वभाव वाली थी। उनका पति भी विवेकी और सुशील था। शीला और उसका पति कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे। शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे।

देखते ही देखते समय बदल गया। शीला का पति बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा। अब वह जल्द से जल्द करोड़पति बनने के ख्वाब देखने लगा। इसलिए वह गलत रास्ते पर चल पड़ा फलस्वरूप वह रोडपति बन गया। यानी रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी उसकी हालत हो गई थी।शराब, जुआ, रेस, चरस-गाँजा वगैरह बुरी आदतों में शीला का पति भी फँस गया। दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई। इस प्रकार उसने अपना सब कुछ रेस-जुए में गँवा दिया।

शीला को पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ, किन्तु वह भगवान पर भरोसा कर सबकुछ सहने लगी। वह अपना अधिकांश समय प्रभु भक्ति में बिताने लगी। अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी। शीला ने द्वार खोला तो देखा कि एक माँजी खड़ी थी। उसके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था। उनकी आँखों में से मानो अमृत बह रहा था। उसका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलक रहा था। उसको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई। शीला के रोम-रोम में आनंद छा गया। शीला उस माँजी को आदर के साथ घर में ले आई। घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था। अतः शीला ने सकुचाकर एक फटी हुई चद्दर पर उसको बिठाया।

माँजी बोलीं- क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं? हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहाँ आती हूँ।' इसके बावजूद शीला कुछ समझ नहीं पा रही थी। फिर माँजी बोलीं- 'तुम बहुत दिनों से मंदिर नहीं आईं अतः मैं तुम्हें देखने चली आई।'माँजी के अति प्रेमभरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया। उसकी आँखों में आँसू गए और वह बिलख-बिलखकर रोने लगी। माँजी ने कहा- 'बेटी! सुख और दुःख तो धूप और छाँव जैसे होते हैं। धैर्य रखो बेटी! मुझे तेरी सारी परेशानी बता।'

माँजी के व्यवहार से शीला को काफी संबल मिला और सुख की आस में उसने माँजी को अपनी सारी कहानी कह सुनाई।

कहानी सुनकर माँजी ने कहा- 'कर्म की गति न्यारी होती है। हर इंसान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते हैं। इसलिए तू चिंता मत कर। अब तू कर्म भुगत चुकी है। अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आएँगे। तू तो माँ लक्ष्मीजी की भक्त है। माँ

लक्ष्मीजी तो प्रेम और करुणा की अवतार हैं। वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती हैं। इसलिए तू धैर्य रखकर माँ लक्ष्मीजी का व्रत कर। इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा।'

शीला के पूछने पर माँजी ने उसे व्रत की सारी विधि भी बताई। माँजी ने कहा- 'बेटी! माँ लक्ष्मीजी का व्रत बहुत सरल है। उसे वैभव लक्ष्मी व्रत कहा जाता है। यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है। वह सुख-संपत्ति और यश प्राप्त करता है।'

 

शीला यह सुनकर आनंदित हो गई. शीला ने संकल्प करके आँखें खोली तो सामने कोई न था. वह विस्मित हो गई कि मांजी कहां गईं? शीला को तत्काल यह समझते देर न लगी कि मांजी और कोई नहीं साक्षात्‌ लक्ष्मीजी ही थीं.

दूसरे दिन शुक्रवार था. सबेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने मांजी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया. आखिरी में प्रसाद वितरण हुआ. यह प्रसाद पहले पति को खिलाया. प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया. उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं. शीला को बहुत आनंद हुआ. उनके मन में 'वैभवलक्ष्मी व्रत' के लिए श्रद्धा बढ़ गई.
शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक 'वैभवलक्ष्मी व्रत' किया. इक्कीसवें शुक्रवार को माँजी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि कर के सात स्त्रियों को 'वैभवलक्ष्मी व्रत' की सात पुस्तकें उपहार में दीं. फिर माताजी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' की छबि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगीं- 'हे मां धनलक्ष्मी! मैंने आपका 'वैभवलक्ष्मी व्रत' करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है. हे मां! मेरी हर विपत्ति दूर करो. हमारा सबका कल्याण करो. जिसे संतान न हो, उसे संतान देना. सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना. कुंआरी लड़की को मनभावन पति देना. जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना. सभी को सुखी करना. हे माँ! आपकी महिमा अपार है.' ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' की छबि को प्रणाम किया.

व्रत के प्रभाव से शीला का पति अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा. उसने तुरंत शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए. घर में धन की बाढ़ सी आ गई. घर में पहले जैसी सुख-शांति छा गई. 'वैभवलक्ष्मी व्रत' का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियां भी विधिपूर्वक 'वैभवलक्ष्मी व्रत' करने लगीं.

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