प्राचीन समय की बात है। समुद्र मंथन के दौरान जब देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्त करने का प्रयास किया, तब भगवान विष्णु ने भी इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मान्यता है कि इसी दौरान अमृत की कुछ बूंदें दूर्वा घास पर गिरीं। अमृत के स्पर्श से दूर्वा को पवित्र और विशेष माना जाने लगा।
एक दूसरी पौराणिक कथा भगवान गणेश से जुड़ी है। कहा जाता है कि अनलासुर नामक असुर के कारण देवता और ऋषि बहुत परेशान थे। उनकी रक्षा के लिए भगवान गणेश ने उसका सामना किया और उसका अंत कर दिया। लेकिन अनलासुर को निगलने के बाद गणेश जी के शरीर में अत्यधिक गर्मी उत्पन्न हो गई।
देवताओं और ऋषियों ने उनकी गर्मी शांत करने के कई प्रयास किए, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली। अंत में ऋषियों ने भगवान गणेश को दूर्वा अर्पित की। दूर्वा ग्रहण करने के बाद उनके शरीर की गर्मी शांत हो गई।
तभी से दूर्वा भगवान गणेश को प्रिय मानी जाने लगी। दूर्वा अष्टमी के दिन भक्त गणेश जी को श्रद्धापूर्वक दूर्वा अर्पित करते हैं और सुख, शांति, समृद्धि तथा परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से पूजा करने और दूर्वा अर्पित करने से भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने का आशीर्वाद मिलता है।