सौभाग्य सुंदरी व्रत का महत्व- हमारे शास्त्रों में सौभाग्य सुंदरी व्रत को बहुत ही पुण्यकारक और लाभकारी माना गया है. सौभागय सुंदरी व्रत को सभी महिलाएं अपने पति और पुत्र की लंबी आयु और स्वस्थ जीवन की कामना के लिए करती हैं. माता पार्वती की पूजा के साथ सौभाग्य सुंदरी के व्रत का समापन किया जाता है. सौभाग्य सुंदरी व्रत को करने से स्त्रियों को अखण्ड सौभाग्य का वरदान मिलता है. शास्त्रों में सौभाग्य सुंदरी व्रत का महत्व करवा चौथ के बराबर ही बताया गया है. सौभाग्य सुंदरी व्रत के दिन महादेव शिव और मां पार्वती की पूजा एक साथ की जाती है. माता पार्वती और भगवन शिव के आशीर्वाद से स्त्रियों को सुख समृद्धि और कल्याण की प्राप्ति होती है. सभी स्त्रियां सौभाग्य सुंदरी का व्रत पूरी श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ रखती हैं. इस व्रत को और भी कई नामो से जाना जाता हैं जैसे- गौरी तृतीया, सौभाग्यशयन व्रत और सौभाग्य सुंदरी व्रत…. इस दिन सभी पत्नियां अपने अपने पतियों के लिए अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए अन्न जल ग्रहण किये बिना पूरा दिन उपवास करती हैं. मान्यताओं के अनुसार सौभाग्य सुंदरी का व्रत करने से विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ती होती है.
यमुना छठ का महत्व- यमुना छठ के पर्व को प्रमुख रूप से मथुरा-वृंदावन में मनाया जाता है. यह त्यौहार देवी यमुना के धरती पर अवतरित होने का प्रतीक माना जाता है. इसलिए इस दिन को यमुना जयंती या देवी यमुना छठ के रूप में भी मनाया जाता है. यमुना छठ का पर्व चैत्र मॉस में पड़ने वाली शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन मनाया जाता है. यह पर्व चैत्र नवरात्रि के दौरान मनाया जाता है. इसीलिए यमुना छठ के पर्व को ब्रज के लोग बहुत ही श्रध्दा पूर्वक मनाते हैं. यही कारण है कि यमुना छठ का पर्व प्रमुख रूप से मथुरा और वृंदावन में मनाया जाता है. इस बार यमुना छठ का पर्व 30 मार्च के दिन मनाया जायेगा. यमुना छठ के लाभ- • यमुना सूर्य देव की पुत्री और यमराज की बहन हैं, शनि देव भी यमुना के ही भाई हैं. • मान्यताओं के अनुसार यमुना छठ के दिन यमुना नदी में स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप धूल जाते हैं और उसे मृत्यु के पश्चात् मोक्ष की प्राप्ति होती है. • ब्रिज में यमुना नदी को माता के रूप में माना जाता है. • गर्ग संहिता के अनुसार जब भगवान् विष्णु जी ने कृष्ण अवतार लिया था तब उन्होंने माता लक्ष्मी जी से पृथ्वी पर राधा के रूप में जन्म लेने के लिए कहा था. तब माँ लक्ष्मी ने विष्णु जी से यमुना को भी पृथ्वी पर भेजने के लिए कहा और तभी पृथ्वी पर य़मुना नदी अवतरित हुई.
घट स्थापना
सामान्य रूप से देखा जाये तो दुनिया भर में नव वर्ष जनवरी की पहली तरीक को मनाया जाता है। चैत्र मास की प्रतिपदा तिथि से नवरात्रो की शुरुआत के साथ साथ नव वर्ष भी प्रारम्भ होता है। मान्यताओं के अनुसार इसी तिथि के दिन माता का प्राकट्य हुआ व् माँ दुर्गा के कहने पर ही ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की शुरुआत की शुरुआत की थी। नव वर्ष का प्रारम्भ ऋतू परिवर्तन भी लेकर आता इसीलिए, नव वर्ष के प्रारम्भ में बदली ऋतू के साथ खुद के स्वास्थय को नियमित करने के लिए उपवास कर, शरीर को स्वास्थ्य किया जाता है।
चैत्र नवरात्री मे शक्ति, प्रेम, सौम्यता, की देवी माँ दुर्गा की नौ दिन तक पूजा की जाती है| नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान मां शक्ति के नौ रूपों की पूजा की जाती है| इस पर्व की तैयारी में घर का हर एक सदस्य जुड़ जाता है| बड़े बुज़ुर्ग से लकर छोटे बच्चों तक हर किसी को इस पर्व से बहुत प्रेम है| नवरात्री के दौरान पूजा उपासना के अलावा लोग अन्य कार्यक्रमो का आयोजन भी करते है जैसे जागरण, डांडिया, मेला| नवरात्री के दौरान माहिलाएं घर को सजाती हैं, खुद भी श्रृंगार करती है और मेहँदी लगती हैं| नवरात्री के दौरान पूरे नौ दिन तक व्रत करने का बहुत महत्व है| नवरात्री की शुरुआत कलश स्थापना से होती है, जिसे घटस्थापना भी कहा जाता है| कलशस्थापना के साथ इस नवरात्री में जौ बोना भी बहुत महत्वपूर्ण होता है| जिसे घर की सुख समृद्धि और सम्पन्नता के लिए बोया जाता है|कलश स्थापना नवरात्री के पहले दिन चैत्र मास की प्रतिपदा तिथि को की जाती है|कलश स्थापना व् पूजा विधि|
माता ब्रह्मचारिणी: - या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
ब्रह्मका अर्थ है तप और चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली अर्थात तप का आचरण करने वाली आदिस्रोत शक्ति|
रूप: मां ब्रह्मचारिणी सदैव शांत और संसार सेविरक्त होकर तपस्या में लीन रहती हैं। कठोरतप के कारण इनके मुख पर अद्भुत तेज विद्यमान रहता है। मां के हाथों में अक्ष माला और कमंडल होता है। मांको साक्षात ब्रह्म का स्वरूप माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी के स्वरूप की उपासना कर सहज ही सिद्धि प्राप्ति होती है।
श्रृंगार: माँ ब्रह्मचारिणी ब्रह्मचर्य में लीन रहने के कारण सादगी से रहती है| उन्हें फूलों का श्रृंगार अर्पित करें|
माता चंद्रघंटा:- या देवी सर्वभूतेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
श्रीदुर्गा का तृतीय रूपश्री चंद्रघंटा है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। नवरात्रि के तृतीय दिन इनका पूजन और अर्चना किया जाता है। इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतःप्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।इनकी आराधना से मनुष्य के हृदय से अहंकार का नाश होता है तथा वह असीम शांति की प्राप्ति कर प्रसन्न होता है। माँ चन्द्रघण्टा मंगल दायनी है तथा भक्तों को निरोग रखकर उन्हें वैभव तथा ऐश्वर्य प्रदान करती है।
रूप:- मां चंद्रघंटा सिंह पर विराजती हैं। मां चंद्रघंटा देवी का स्वरूप सोने के समान कांतिवान है।देवी मां की दस भुजाएं हैं और दसों हाथों में खड्ग, बाण है। मां चंद्रघंटा के गले में सफेद फूलों की माला रहती है।
श्रृंगार:- माँ चंद्रघंटा को लाल रंग के वस्त्र अर्पित करें साथ ही सफ़ेद फूल भी अर्पित करें|
माता कूष्माण्डा: - यादेवीसर्वभूतेषुमाँकूष्माण्डारूपेणसंस्थिता।नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनम:॥
रूप:- इस देवी कीआठ भुजाएं हैं, इसलिए अष्टभुजाकहलाईं। इनके सात हाथोंमें क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प,अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथागदा हैं। आठवें हाथमें सभी सिद्धियों औरनिधियों को देने वालीजप माला है।
शृंगार:- माँ कूष्माण्डा कोपीले वस्त्र अर्पित करें और साथही पीले फूल औरमाला भी अर्पित करें|
माता कात्यायनी:- या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
नवदुर्गा के छठवें स्वरूप में माँ कात्यायनी की पूजा की जाती है. माँ कात्यायनी का जन्म कात्यायन ऋषि के घर हुआ था अतः इनको कात्यायनी कहा जाता है| ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं, गोपियों ने कृष्ण की प्राप्ति के लिए इनकी पूजा की थी. विवाह सम्बन्धी मामलों के लिए इनकी पूजा अचूक होती है, योग्य और मनचाहा पति इनकी कृपा से प्राप्त होता है|
रूप:- इनकी चार भुजाएं हैं। दाईं तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में। मां के बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार है व नीचे वाले हाथ में कमल का फूल सुशोभित है। इनका वाहन भी सिंह है।
माता कालरात्रि:- या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
दुर्गा के इस सातवें रूप को कालरात्रि के नाम से जाना जाता है जो इस संसार में आदि काल से सुप्रसिद्ध है। इन माँ की मूर्ति यद्यपि बड़ी ही विकराल प्रतीत होती है, जो परम तेज से युक्त है जो भक्तों के हितार्थ अति भयानक कालिरात्रि के रूप मे प्रकट होती हैं। नका रंग काला होने के कारण ही इन्हें कालरात्रि कहा गया और असुरों के राजा रक्तबीज का वध करने के लिए देवी दुर्गा ने अपने तेज से इन्हें उत्पन्न किया था|
रूप:- देवी कालरात्रि का शरीर रात के अंधकार की तरह काला है इनके बाल बिखरे हुए हैं और इनके गले में विधुत की माला है. इनके चार हाथ हैं जिसमें इन्होंने एक हाथ में कटार और एक हाथ में लोहे का कांटा धारण किया हुआ है. इसके अलावा इनके दो हाथ वरमुद्रा और अभय मुद्रा में है. इनके तीन नेत्र है तथा इनके श्वास से अग्नि निकलती है. कालरात्रि का वाहन गर्दभ(गधा) है|
श्रृंगार:- माँ कालरात्रि को लाल वस्त्र अर्पित करें साथ ही लाल फूलों की माला भी अर्पित करें|
माता महागौरी - या देवी सर्वभूतेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
इनकी पूरी मुद्रा बहुत शांत है। पति रूप में शिव को प्राप्त करने के लिए महागौरी ने कठोर तपस्या की थी। इसी वजह से इनका शरीर काला पड़ गया लेकिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगा के पवित्र जल से धोकर कांतिमय बना दिया। उनका रूप गौर वर्ण का हो गया। इसीलिए ये महागौरी कहलाईं।
महागौरी का पूजन-अर्चन, उपासना-आराधना कल्याणकारी है। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियां भी प्राप्त होती हैं। ये अमोघ फलदायिनी हैं और इनकी पूजा से भक्तों के तमाम कल्मष धुल जाते हैं। पूर्वसंचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
रूप:- इनके सभी आभूषण और वस्त्र सफेद हैं। इसीलिए उन्हें श्वेताम्बरधरा कहा गया है। 4 भुजाएं हैं और वाहन वृषभ है इसीलिए इनको वृषारूढ़ा भी कहा गया है| इनके ऊपर वाला दाहिना हाथ अभय मुद्रा है तथा नीचे वाला हाथ त्रिशूल धारण किया हुआ है। ऊपर वाले बाँये हाथ में डमरू धारण कर रखा है और नीचे वाले हाथ में वर मुद्रा है।
श्रृंगार:- माँ महागौरी को श्वेत चमकदार वस्त्र अर्पित करें उन्हें लाल सफ़ेद फूलों की माला भी अर्पित करें|
माता सिद्धिदात्री - या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
मां दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्रि-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है।
रूप:- देवी के दाहिनी तरफ नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा तथा बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प है। इनका वाहन सिंह है और यह कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं।
श्रृंगार:- माँ सिद्धिदात्री को हलके गुलाबी रंग के वस्त्र अर्पित करें साथ ही लाल, पीले फूलों की माला अर्पित करें|
जानिए क्या है कामदा एकदशी की व्रत कथा और पूजन विधि
कामदा एकादशी विष्णु भगवान का बहुत ही उत्तम और मनोकामना पूर्ण करने वाला व्रत है। इस व्रत को करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। इसलिए इसे फलदा एकादशी भी कहते हैं। कामदा एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को सभी पापों से मुक्ति मिलती है। कामदा एकादशी मनुष्य के जीवन के सभी कष्टों को दूर करने वाली और मन वांछित फल देने वाली कहीं जाती है। कामदा एकादशी का व्रत चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन किया जाता है।
एक बार पांडू पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से प्रश्न किया कि भगवान यह कामदा एकादशी क्या है। कृपया इसकी महानता का वर्णन करें। तब भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा, जो भी मनुष्य कामदा एकादशी का व्रत करता है उसके जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और वह मृत्यु के पश्चात स्वर्ग को प्राप्त होता है। इसके अलावा जो लोग पुत्र की कामना रखते हैं उनके लिए भी यह व्रत बहुत ही फलदाई है।
प्रदोष का अर्थ प्रदोष का अर्थ है "भारी दोष"| चन्द्रमा को श्रेय रोग होने के कारण चंद्र देव अंतिम साँसे गिन रहे थे| तभी भगवान् शंकर ने चन्द्रमा को पुनर्जीवन देकर मस्तक पर धारण किया| चंद्र मृत्यु के निकट जाकर भी भगवान् शिव की कृपा से जीवित रहे और पूरनमाशी के दिन तक पूर्णता स्वस्थ होक प्रकट हुए| प्रदोष व्रत महत्व जीवन में शारीरिक मानसिक एवं आधयात्मिक रूप से मज़बूत होने के लिए प्रदोष व्रत कारगर मन गया है|प्रदोष व्रत एक ऐसा व्रत है जो मृत्यु के निकट पोहोंचे हुए मनुष्य को जीवन दान देता है| प्रदोष व्रत हर माह के दोनों पक्षों की त्रयोदशी को मनाया जाता है| भगवान् शिव की विशेष और अनंत कृपा पाने के लिए यह व्रत कारगर है| हिन्दू धर्म शास्त्रों में इस व्रत का विशेष महत्व बताया गया है| इस व्रत को हर माह के दोनों पक्षों को करने से व्यक्ति के जीवन के सब कष्टों का निवारण होजाता है| प्रदोष व्रत का अपना महत्व है, परन्तु दिन के अनुसार पड़ने वाले प्रदोष व्रत का अपना अलग महत्व होता है|
प्रदोष का अर्थ प्रदोष का अर्थ है "भारी दोष"| चन्द्रमा को क्षय रोग होने के कारण चंद्र देव अंतिम साँसे गिन रहे थे| तभी भगवान् शंकर ने चन्द्रमा को पुनर्जीवन देकर मस्तक पर धारण किया| चंद्र मृत्यु के निकट जाकर भी भगवान् शिव की कृपा से जीवित रहे और पूरनमाशी के दिन तक पूर्णता स्वस्थ होकर प्रकट हुए| प्रदोष व्रत महत्व जीवन में शारीरिक मानसिक एवं आधयात्मिक रूप से मज़बूत होने के लिए प्रदोष व्रत कारगर मन गया है|प्रदोष व्रत एक ऐसा व्रत है जो मृत्यु के निकट पहुंचे हुए मनुष्य को जीवन दान देता है| प्रदोष व्रत हर माह के दोनों पक्षों की त्रयोदशी को मनाया जाता है| भगवान् शिव की विशेष और अनंत कृपा पाने के लिए यह व्रत कारगर है| हिन्दू धर्म शास्त्रों में इस व्रत का विशेष महत्व बताया गया है| इस व्रत को हर माह के दोनों पक्षों को करने से व्यक्ति के जीवन के सब कष्टों का निवारण होजाता है| प्रदोष व्रत का अपना महत्व है, परन्तु दिन के अनुसार पड़ने वाले प्रदोष व्रत का अपना अलग महत्व होता है|
दुर्गा आष्टमी जैसे की नाम से ही मालूम होता है कि ये व्रत त्यौहार मां दुर्गा को समर्पित है। दुर्गा मां के भक्तों के लिये यह एक खास त्यौहार माना जाता है। और क्योकि यह त्यौहार हर महीने मनाया जाता है इसे मासिक दुर्गा अष्टमी कहा जाता है।
कौन है माता बगलामुखी, जानिए इनका स्वरुप