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माता गंगा ने किया राजा सगर के पुत्रो का उद्धार

माता गंगा ने किया राजा सगर के 60 हजार पुत्रो का उद्धार

पौराणिक कथा के अनुसार माता गंगा श्री विष्णु जी के चरणों से अवतरित हुई | माता गंगा का द्वारा अपने पूर्वजों का उद्धार कराने के लिये राजा दिलीप के पुत्र भागीरथ जी हुये। राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजो का उद्धार करने के लिए मां गंगा की बहुत ही कठोर पूजा अर्चना की ताकि उन्हें प्रसन्न किया जा सके। इसीलिये उन्होंने बहुत ही कठोर तप किया ताकि भगवान शिव माता गंगा को पृथ्वी पर उतारे। इसे बाद मां गंगा राजा भागीरथ जी के पीछे-पीछे कपिल मुनि के आश्रमी में भी गई और उनका स्पर्श पाते ही भागीरथ के पूर्वजों यानि अवतरण राजा सगर के 60 हजार पुत्रो का उद्धार हुआ।
 
माता गंगा से जुड़ी अन्य कथाओं का भी बहुत ही अधिक महत्तव है। 

भगवान वामन के पैर स्पर्श किये गंगा जी ने -

कथा श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्धानुसार राजा बलि जी के लिये तीन पग जमीन नापने के लिये भगवान वामन का बायाँ चरण ब्रह्मांड के ऊपर चला गया। वहीं पर ब्रह्मा जी के द्वारा भगवान के पैर धोने और आशीष प्राप्त करने हेतु जो जलधारा थी वह चार दिशाओं में बंट गई अर्थात् सीता – पूर्व दिशा, अलकनंदा – दक्षिण, चक्षु – पश्चिम और भद्रा – उत्तर – विन्ध्यगिरी के उत्तरी भागो में इसे भागीरथी गंगा के नाम से जाना जाता हैं |यदि बात करें माता गंगा भारतीय साहित्य में देवनदी गंगा के उत्पत्ति के विषय के तो दो प्रकार की विशेष तिथिया बताई जाती हैं |पहली तिथि है बैशाख मास शुक्ल पक्ष तृतीया और दूसरी तिथि है ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की गंगा दशमी

गंगा की कहानी नंबर-2

गंगा माता से जुड़ी और भी कहानियां है जो उनकी महत्ता  दर्शाती है । एक समय की बात है कि पूर्व जन्म में राजा शांतनु महाभिष थे और वह जन्म से ही सदाचारी थे। एक बार वे ब्रह्माजी की सेवा हेतु तल्लीन थे और उस समय वहां माता गंगा भी उपस्थित थी। इतने में ही राज महाभिष जी माता गंगा की सुंदरता पर मोहित हो गये और उन्हें एकटक देखने लगे। मातागंगा भी उनकी ओर आकर्षित हो गई और उन पर मोहित होकर उन्हें देखने प्रेमस्वरुप देखने लगी। ब्रह्मा जी ने यह सब देख लिया और इसे अपना अपमान माना और उनको मनुष्य योनि में जन्म लेकर दु: झेलने का दंश दे दिया।

इसीलिये राजा महाभिष जी ने कुरु राजा शांतनु के रूप में जन्म लिया। वहीं माता गंगा का जन्म ऋषि जह्नु की पुत्री के रूप में हुआ लेकिन उनका जन्म राजा शांतनु से पहले ही हो गया था। एक दिन पुत्र प्राप्ति के लिये शांतनु जी के पिता राजा प्रतीप गंगा जी के तट पर तपस्या कर रहे थे। उनके रुप, सौन्दर्य और तप से प्रभावित होकर गंगा जी उन पर मोहित हो गयी और उनकी दाहिनी जंघा पर आकर विराजमान हो गईं। माता गंगा ने राजा प्रतीप से कहा किराजन! मैं आपसे विवाह करना चाहती हूं और मैं जह्नु ऋषि की पुत्री गंगा हूं। इसे सुनकर राजा प्रतीप ने माता गंगा से कहा कि गंगे! आप मेरी दाहिनी जंघा पर विराजमान हुई जबकि पत्नी को तो वामांगी होना चाहिए क्योकि दाहिनी जंघा को तो पुत्र का प्रतीक माना जाता हैइसीलिये मैं तुम्हें पत्नी नहीं अपितु अपनी पुत्रवधू के रूप में हीस्वीकार करने के बाध्य हूँ।


अपनी तपस्या हेतु महाराजा प्रतीप को पुत्रधन की प्राप्ति हुई और उनका नाम शांतनु रखा गया। राजा शांतनु का विवाह गंगा से हुआ और उन्हें माता गंगा से 8 पुत्र धन की प्राप्ति हुई। माता गंगा ने 7पुत्तों को किसी कारणवश गंगा नदी में बहा दिया गया और सिर्फ 8वें पुत्र का ही लालन-पालन किया। उन्होनें 8वें पुत्र का नाम देवव्रत जो भीष्म के रुप में जाने गये ।

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