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त्रिशूर पूरम उत्स्व का महत्त्व on 03 May 2020 (Sunday)

त्रिशूर पूरम उत्स्व का महत्त्व

जानिये क्या है त्रिशूर पुरम-

त्रिशूर पुरम केरल का एक बहुत ही प्रसिद्ध उत्सव है. इस उत्सव की शुरुआत हाथियों के द्वारा की जाती है. इस उत्सव के उद्घाटन समारोह में बहुत सारे लोग शामिल होते हैं. वडक्कुमनाथन मंदिर में हाथी के द्वारा प्रतीकात्मक रूप से मंदिर के दक्षिणी प्रवेश द्वार को धक्का देकर खोला जाता है जो त्रिशूर पुरम उत्सव के शुभारंभ का संकेत होता है. इस उत्सव को लगातार 36 घंटो तक मनाया जाता है. त्रिशूर पुरम उत्स्व केरल का एक वार्षिक उत्सव है जिसे वल्लुनावाडु क्षेत्र में मनाया जाता है. यह उत्स्व माँ दुर्गा और भगवान भोलेनाथ को समर्पित है. इस उत्सव में सभी लोग रंग-बिरंगे परिधानों को पहन कर शामिल होते हैं. इसके अलावा इस उत्स्व में हाथियों की विशेष साज-सज्जा लोगों के आकर्षण का केंद्र होती हैं. त्रिशूर पूरम उत्स्व में पूरी रात आतिशबाजी की जाती है और हाथियों को तरह तरह  के आभूषणों से सजा कर झांकियां निकाली जाती हैं और लोगों में प्रसाद बांटा जाता है.

त्रिशूर पुरम उत्स्व का महत्व

दक्षिण भारत में त्रिशूर पूरम उत्स्व को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है. इस उत्स्व का आयोजन केरल में किया जाता है. त्रिशूर पुरम उत्सव में शामिल होने के लिए स्थानीय लोगों के साथ साथ सैंकड़ों पर्यटक भी आते है. त्रिशूर पुरम उत्स्व का आरम्भ शक्थान थम्पूरन के द्वारा किया गया था. शक्थान कोच्ची का एक महान शासक था. उसी समय से दस मंदिरों को इकठ्ठा करके इस उत्सव को बहुत ही हर्षोल्लास और धूमधाम के साथ मनाया जाता है. त्रिशूर पुरम उत्स्व में परमेक्कावु, थिरुवमबाड़ी कनिमंगलम, करमकु, लल्लूर, चूरकोट्टुकरा, पनामुक्कमपल्ली, अय्यनथोले, चेम्बुकावु और नेथिलाकवु मंदिर हिस्सा लेते हैं. इस उत्सव में 30 हाथियों को पूरी तरह से सजा कर शामिल किया जाता है. त्रिशूर पुरम उत्स्व के दौरान पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ इलान्जिथारा मेलम नामक यंत्र भी बजाय जाता है. इस कार्यक्रम में लगभग 250 कलाकार हिस्सा लेते हैं. केरल के अलग अलग मंदिरों से सर्वश्रेष्ठ हाथियों को इस उत्सव में हिस्सा लेने के लिए त्रिचूर भेजा जाता है. इस उत्सव का आरंभ प्रातःकाल में ही हो जाता है इसके अलावा इसी समय माँ दुर्गा को समर्पित कनिमंगलम शास्ता नामक प्रथा का भी आरम्भ होता है.

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