गुप्त नवरात्रि में मां मातंगी की पूजा का महत्व- हमारे शास्त्रों में गुप्त नवरात्रि को बहुत ही शुभ और महत्वपूर्ण माना गया है. गुप्त नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों के साथ-साथ 10 महाविद्याओं की पूजा भी की जाती है. गुप्त नवरात्रि के नौवें दिन मां मातंगी की पूजा की जाती है. मां मातंगी 10 महाविद्याओं में नौवीं विद्या है. मान्यताओं के अनुसार जो भी व्यक्ति गुप्त नवरात्रि के नौवें दिन मां मातंगी की पूजा आराधना करता है उसे सर्व सिद्धियों की प्राप्ति होती है. माँ मातंगी अपने भक्तो के सभी कष्टों को दूर कर के उन्हें सौभाग्य का आशीर्वाद देती हैं
गुप्त नवरात्री में माँ कमला की पूजा का महत्तव- माँ कमला दस महा विद्याओं में सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती हैं ये दस महाविद्याओं में दसवीं महाविद्या है. माँ कमला को शक्ति के प्रथम अवतार ले रूप आदि शक्ति के नाम से भी जाना जाता हैं . शास्त्रों में माँ कमला को भाग्य, सम्मान, पवित्रता और परोपकार की देवी माना गया है . देवी कमला सभी दिव्य गतिविधियों में उर्जा के रूप में मौजूद रहती हैं. माँ कमला भगवान विष्णु की दिव्य शक्ति हैं गुप्त नवरात्री में माँ कमला की पूजा करने से कौशल विकास एवं गुणवत्ता में बढ़ोतरी होती हैं . इनकी पूजा से माँ लक्ष्मी की पूजा के समान पुण्य प्राप्त होता माँ कमला अपने भक्तो को धन और ऐश्वर्य का वरदान देती हैं. खासकर गर्भवती महिलाओं के लिए माँ कमला की पूजा बहुत महत्वपूर्ण होती है माँ कमला गर्भवती स्त्री के गर्भ की रक्षा करती हैं .उनका पोषण करती है.
रथ सप्तमी का महत्त्व- रथ सप्तमी के दिन भगवान् सूर्यदेव की पूजा उपासना की जाती है. मान्यताओं के अनुसार रथ सप्तमी के दिन भगवान् सूर्य देव सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर प्रकट हुए थे, इसलिए रथ सप्तमी को सूर्य देव के जन्म दिन के रूप में भी मनाते है. शास्त्रों के अनुसार रथ सप्तमी के दिन श्रद्धा पूर्वक सूर्य देव को अर्घ्य देने और पूजा करने से मनुष्य की सभी मनोकानायें पूरी हो जाती है और साथ ही धन और पुत्र रत्न की भी प्राप्ति होती है.
नर्मदा जयंती का महत्व- हमारे देश में सभी नदियों को बहुत ही महत्वपूर्ण और पूजनीय माना जाता है इन्ही नदियों में से एक हैं नर्मदा नदी. शास्त्रों में नर्मदा नदी को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है . नर्मदा जयंती के दिन श्रद्धा पूर्वक मां नर्मदा की पूजा अर्चना की जाती है. हमारे देश में नर्मदा जयंती को एक पर्व के रूप में बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. विशेष रूप से नर्मदा जयंती का पर्व मध्य प्रदेश के अमरकंटक जिले में बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है. शास्त्रों में बताया गया की मध्यप्रदेश के अमरकंटक जिले से मां नर्मदा की उत्पत्ति हुई थी. नर्मदा जयंती का पर्व माघ के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन मनाया जाता है. हिन्दू धर्म में 7 नदियों को अत्याधिक महत्वपूर्ण माना गया है. इन सात नदियों में एक नदी नर्मदा नदी भी एक महत्वपूर्ण नदी है.
भीष्म अष्टमी पर्व का महत्व- माघ महीने की शुक्ल पक्ष अष्टमी के दिन भीमाष्टमी का पर्व मनाया जाता है. शास्त्रों के अनुसार इसी दिन भाष्म पितामाह ने अपने शरीर का त्याग किया था, इसलिए इस दिन को बिषम अष्टमी या निवार्ण के रूप में मनाया जाता है. मान्यताओं के अनुसार जो लोग पूरी श्रद्धा के साथ भीमाष्टमी का व्रत करते हैं उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. और साथ ही पितृदोष से भी मुक्ति मिलती है.मान्यताओं के अनुसार इस दिन भीष्म पितामाह ने अपनी इच्छा से अपने शरीर का त्याग किया था. इसलिए जो भी व्यक्ति इस दिन पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ भीष्म पितामह के नाम से तिल, जल के साथ श्राद्ध, तर्पण करता है और गरीबो को दान दक्षिणा देता उसे मृत्यु के पश्चात् मोक्ष की प्राप्ति होती है।
संधि पूजा का महत्व- हिन्दू धर्म में संधि पूजा को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। संधि पूजा नवरात्रि उत्सव के दौरान मनाई जाती है। इस पूजा को एक विशेष समय पर किया जाता है, अर्थात संधि पूजा उस समय के दौरान की जाती है जब अष्टमी तिथि समाप्त होकर नवमी तिथि आरम्भ होती है।अष्टमी तिथि खतम होने के दौरान आखिरी 24 मिनट और नवमी तिथि के दौरान प्रथम 24 मिनट एक साथ मिलकर संधिक्षण बनाते हैं, अर्थात ये वो समय होता है जब माँ दुर्गा ने देवी चामुंडा का अवतार धारण किया था और असुर चंड और मुंड का संघार किया था।
जया एकादशी का महत्व- हमारे धर्म शास्त्रों में जया एकादशी को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है. शास्त्रों के अनुसार जया एकदशी बहुत ही पुण्यदायी और कल्याणकारी होती है. मान्यताओं के अनुसार जया एकादशी का उपवास करने से मनुष्य का जन्म बुरी योनि अर्थात भूत पिशाच की योनि में नहीं होता है. इसके अलावा जो भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ जया एकादशी का व्रत करता है उसके सभी पापों का नाश होता है और घर में सुख-संपत्ति आती है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जया एकादशी का व्रत करने से दुख, दरिद्रता और कष्टों से छुटकारा मिलता है कब है जया एकादशी - • हिन्दू पंचांग के मुताबिक़ हर साल माघ मॉस के शुक्ल पक्ष में जया एकादशी का त्यौहार मनाया जाता है. • ग्रगोरियन कैलेंडर के अनुसार जया एकदशी हर वर्ष जनवरी या फरवरी महीने में पड़ती है.
थाईपुसम का महत्व- थाईपुसम का त्योहार मुख्य रूप से दक्षिण भारत में मनाया जाता है. थाईपुसम के त्यौहार को तमिलनाडु तथा केरल के साथ साथ अमेरिका, श्रीलंका, अफ्रीका, थाइलैंड जैसे दूसरे देशों में भी तमिल समुदाय के लोग बहुत ही उत्साह और उल्लास के साथ मनाते है. थाईपुसम के दिन शिव जी के बड़े पुत्र भगवान मुर्गन की पूजा अर्चना करने का विधान है. थाईपुसम का उत्सव तमिल कैलेंडर के अनुसार थाई माह के पूर्णिमा तिथि के दिन मनाया जाता है. यह त्योहार तमिलनाडु में रहने वाले हिंदुओं का प्रमुख त्योहार माना है. थाईपुसम के दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रुप में मनाया जाता हैं.
फाल्गुन मास का महत्व - हिंदु कैलेंडर के अनुसार फाल्गुन महीने को साल का अंतिम महीना माना जाता है. फाल्गुन महीना अध्यात्म के साथ ही उत्सव के लिए भी जाना जाता है. इस मॉस में रंगों का त्योहार होली, शिव-पार्वती के विवाह का प्रसंग महाशिवरात्रि मनाये जाते हैं. इसके अलावा फाल्गुन मॉस में ही वसंत ऋतु का उत्सव भी मनाया जाता है. फाल्गुन मॉस में विशेष रूप से दो देवताओं की पूजा की जाती है. पहले भगवान कृष्ण और दूसरे चंद्रमा. फाल्गुन महीने में भगवान कृष्ण के साथ साथ साथ चंद्रदेव की आराधना का भी महत्व है क्योंकि पुराणों के अनुसार चंद्रदेव का जन्म भी फाल्गुन मास में ही हुआ था.
जानिए क्या है कुम्भ संक्रांति का महत्व और पूजन विधि शास्त्रों में बताया गया है की जब सूर्य मकर राशी से कुम्भ राशी में प्रवेश करता है तो उस तिथि को कुम्भ संक्रांति के रूप में मनाया जाता हैं. पुरे साल में पड़ने वाली 12 संक्रतियों में से कुम्भ संक्राति फाल्गुन मॉस में और 11वे क्रम पर आती हैं. कुम्भ संक्रांति हमेशा एक ही तिथि पर नहीं मनाई जाती हैं. हमेशा सूर्य के दिशा और स्थिति के मुताबिक़ कुम्भ संक्राति का पर्व मनाया जाता हैं. ज़्यादातर कुम्भ संक्रांति का पर्व फरवरी या मार्च महीने में मनाया जाता हैं.
जानिये क्यों मनाई जाती है यशोदा जयंती, क्या है इसका महत्व हिन्दू धर्म में यशोदा जयंती को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। यशोदा जंयती का पर्व भगवान श्री कृष्ण की माँ यशोदा के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। ये बात तो सभी को पता है की भगवान श्री कृष्ण ने माता देवकी के गर्भ से जन्म लिया था पर इनका पालन पोषण माता यशोदा ने अपनी छत्रछाया में किया था। शास्त्रो में बताया गया है की अगर कोई स्त्री इस दिन पूरी श्रद्धा के साथ माता यशोदा और भगवान श्री कृष्ण का पूजन करती है तो उसे भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप के दर्शन प्राप्त होते हैं। आज हम आपको इस आर्टिक्ल के माध्यम से बताने जा रहे है की इस साल यशोदा जयंती कब मनाई जाएगी और यशोदा जयंती का शुभ मुहूर्त क्या है।
शबरी जयंती का महत्व- हिन्दू कैलेंडर के अनुसार शबरी जयंती का पर्व हर साल फाल्गुन महीने की सप्तमी तिथि के दिन मनाया जाता है. शबरी जयंती का पर्व मुख्य रूप से गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में मनाया जाता है. शबरी जयंती के दिन तरह तरह के धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते है. दक्षिण भारत के भद्रचल्लम के सीतारामचन्द्रम स्वामी मंदिर में इस दिन को एक बड़े उत्सव के रूप में बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है. शबरी जयंती के दिन शबरी माता की पूजा एक देवी के रूप में की जाती है. राम भक्त शबरी की बहुत सारी कथाएं रामायण भागवत रामचरितमानस आदि ग्रंथो में किया गया है. भगवान् श्रीराम ने अपनी सबसे बड़ी भक्त शबरी के जूठे बेरों को ग्रहण किया था. इसी वजह से इस दिन को शबरी माता के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है. और उनका पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ पूजन किया जाता है.
क्यों मनाया जाता है जानकी जयंती का पर्व जानकी जंयती का पर्व फाल्गुन महीने में पड़ने वाले कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है. जानकी जयंती के दिन विशेष रूप से माता सीता की पूजा की जाती है. मान्यताओं के अनुसार अगर कोई सुहागन महिला जानकी जयंती के दिन व्रत रखकर माता सीता की विधिवत पूजा करती है तो उसके दाम्पत्य जीवन से जुडी सभी परेशानियां खत्म हो जाती है. जानकी जंयती को सीता अष्टमी भी कहा जाता है. जानकी जयंती का महत्व- • जानकी जयंती का दिन सुहागन महिलाओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है. • जानकी जयंती के दिन सभी सुहागन महिलायें अपने पति के लंबी आयु के लिए माता सीता की श्रद्धा पूर्वक पूजा - अर्चना करती है • जानकी जंयती के दिन विशेष रूप से माता सीता की पूजा की जाती है. • जानकी जयंती को माता सीता के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है. • जानकी जयंती के दिन सभी सुहागिन महिलायें अपने घर की सुख शांति और अपने पति की लंबी आयु के लिए उपवास करती हैं. • इस दिन राम मंदिरों में भगवान श्री राम और माता सीता की विशेष पूजा आयोजित की जाती है. • सभी भक्त इस दिन श्रीराम और माता सीता के दर्शन करने के लिए मंदिर जाते है. • जानकी जयंती के दिन जो भी मनुष्य पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ भगवान श्री राम और माता सीता की पूजा करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है और साथ ही उसे सोलह महा दान का फल प्राप्त होता है.
फुलेरा दूज का महत्व और पूजा विधि फुलेरा दूज का त्यौहार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के दिन मनाया जाता है. बसंत पंचमी के पर्व के बाद और होली के पर्व से पहले फुलेरा दूज का त्योहार एक बड़े त्यौहार के रूप में मनाया जाता है. फुलेरा दूज का पर्व खास रूप से मथुरा और वृंदावन में बड़ी ही धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से फुलेरा दूज का महत्व और पूजन विधि बताने जा रहे हैं. फुलेरा दूज का महत्त्व- • फुलेरा दूज का पर्व विशेष रूप से उत्तरी भारत में मनाया जाता है. • फुलेरा दूज को रंगों का त्योहार भी कहा जाता है. • फुलेरा दूज का पर्व भगवान श्री कृष्ण और राधा जी के मिलन के रूप मे मनाया जाता है. • फुलेरा दूज का पर्व विशेष रूप से मथुरा और वृंदावन में बड़े स्तर पर मनाया जाता है. • इस दिन सभी मंदिरों में भजन कीर्तन और कृष्ण लीलाओं का आयोजन किया जाता हैं. • मान्यताओं के अनुसार फुलेरा दूज का दिन दोष मुक्त माना गया है. इसलिए फुलेरा दूज के दिन किसी भी तरह के शुभ और मांगलिक कार्य किये जा सकते है. • फुलेरा दूज के दिन भगवन श्री कृष्ण की पूजा की जाती है और उन्हें गुलाल चढ़ाया जाता है.
क्यों मनाया जाता है होलाष्टक का पर्व, जानिए क्या है इसका महत्त्व
चन्द्र मास के मुताबिक फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि के दिन होलिका का त्यौहार बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है. होलाष्टक से ही होली का त्यौहार आने की सूचना प्राप्त होती है. होलाष्टक को होली के त्यौहार की खबर लेकर आने वाला एक हरकारा भी कहा जाता है. "होलाष्टक" अर्थात होला+अष्टक मतलब होली से आठ दिन पहले, के समय को होलाष्टक कहा जाता है. शास्त्रों में होली के पर्व को पूरे नौ दिनों का त्यौहार माना गया है. धुलेण्डी के दिन रंग और गुलाल खेल कर यह त्यौहार खत्म होता है.