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आमलकी एकादशी | Amlaki Ekadashi on 27 Feb 2026

आमलकी एकादशी का महत्व-

आमलकी एकादशी का पर्व फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है. इसे आंवला एकादशी भी कहा जाता है. आमलकी एकादशी शुभ पुष्य नक्षत्र में मनाई जाती है. आमलकी एकादशी को मोक्ष प्राप्ति के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है. भागवत पुराण में बताया गया है कि आमलकी एकादशी का महत्व अक्षय नवमी के बराबर होता है. शास्त्रों में बताया गया है जो भी मनुष्य आमलकी एकादशी का व्रत विधि पूर्वक करता है उसे मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है. आमलकी एकादशी में मुख्य रूप से भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की जाती है.


नरसिम्हा द्वादशी | Narsimha Dwadashi on 28 Feb 2026

नरसिम्हा द्वादशी के दिन इन तरीको से करें भगवान् नरसिंह की पूजा

शास्त्रों में बताया गया है की फाल्गुन मॉस की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि के दिन नृसिंह द्वादशी का पर्व मनाया जाता है. नरसिम्हा द्वादशी के बारे में वेदों और  पुराणों में भी किया गया है

नरसिम्हा द्वादशी का महत्व-

• शास्त्रों में भगवान विष्णु के बारह अवतारों के बारे में बताया गया है.

• मान्यताओं के अनुसार नरसिम्हा द्वादशी के दिन भगवान् विष्णु के अवतार भगवान नरसिंह एक खंभे को चीर कर प्रकट हुए थे.

• भगवान् नरसिम्हा के अवतार में उनका आधा शरीर मनुष्य का है और आधा शेर का.

• भगवान् विष्णु ने यही रूप धारण करके असुरों के राजा हिरण्यकशिप का संघार किया था.

• उसी दिन से इस दिन ये पर्व मनाया जाता है.

• शास्त्रों के अनुसार नरसिंह द्वादशी का व्रत करने से ब्रह्महत्या का पाप भी मिट जाता है.

• नरसिंह द्वादशी का व्रत करने से मनुष्य को सांसारिक सुख, भोग और मोक्ष तीनों की प्राप्ति होती  है.

• जो भी मनुष्य सच्चे मन से नृसिंह द्वादशी के दिन भगवान् नरसिंह का व्रत करता है उसके सात जन्मों के पाप खत्म हो जाते है और वो अपार धन-संपत्ति का मालिक होता है.

• भगवान विष्णु ने नरसिम्हा अवतार धारण करके अपने परम भक्त प्रहलाद को भी वरदान दिया कि, जो भी मनुष्य नरसिम्हा द्वादशी के दिन शुद्घ मन से उनका व्रत और पूजा करेगा उसकी सभी मनोकामनायें पूरी होंगी.


मासी मागम | Maasi Magham on 03 Mar 2026

जानिए क्या है मासी मागम का महत्व और पूजन विधि

मासी मागम का त्यौहार मुख्य रूप से तमिलनाडु और केरल में मनाया जाने वाला एक बहुत ही महत्वपूर्ण त्योहार है. मासी मागम का त्यौहार मासी (फरवरी - मार्च) के तमिल महीने में मनाया जाता है. मागम को ज्योतिष प्रणाली में सत्ताईस सितारों में से एक माना जाता है. यह त्यौहार मासी महीने में आमतौर पर पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. इसी वजह से इसे दक्षिण भारत में विशेष रूप से तमिलनाडु, पॉन्डिचेरी और केरल में शुभ माना जाता है. मासी मागम का त्यौहार बारह वर्षों में एक बार आता है. जिस वक़्त बृहस्पति मासी मग दिवस पर सिंह राशि में प्रवेश करता है तब मासी मागम का त्यौहार बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है. मासी मागम पर्व के दिन सभी प्रकार के अनुष्ठान, पवित्र कार्य और पूजा की जा सकती है.


अट्टुकल पोंगल | Attukal Pongal on 03 Mar 2026

क्यों मनाया जाता है अट्टु पोंगल का पर्व

अट्टु पोंगल का पर्व केरल के त्रिवेंद्रम में बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। केरल में यह त्यौहार बहुत से धार्मिक मंदिरो में बहुत सारे भक्तो की उपस्थ्ति में मनाया जाता है। विशेष रूप से अट्टु पोंगल का पर्व अटुकल भगवती मंदिर में पोंगाला उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

कब मनाया जाता है अट्टु पोंगल का पर्व -

फरवरी और मार्च के महीने के दौरान यह केरल में हर साल आयोजित किया जाता है और इसे बहुत ही मस्ती और उत्साह के साथ मनाया जाता है।


लक्ष्मी जयंती | Lakshmi Jayanti on 03 Mar 2026

लक्ष्मी जयंती का महत्व-

हिंदू धर्म में लक्ष्मी जयंती का व्रत बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है. लक्ष्मी जयंती का व्रत फाल्गुन माह में किया जाता है. लक्ष्मी जयंती के दिन माता लक्ष्मी की खास पूजा की जाती है. भविष्य पुराण में बताया गया है कि लक्ष्मी जयंती के दिन विधि विधान के साथ मां लक्ष्मी का पूजन करने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है. माँ लक्ष्मी बहुत ही दयालु हैं इसलिए जो भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ लक्ष्मी जयंती के दिन इनकी पूजा अर्चना करता है उसके जीवन में कभी भी धन की कमी नहीं होती है और उसके परिवार में हमेशा खुशहाली बनी रहती है

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लक्ष्मी जयंती-

भविष्य पुराण के अनुसार एक बार माता लक्ष्मी देवताओं से नाराज होकर क्षीरसागर के अंदर प्रवेश कर गयी थी. इसके बाद सभी देवता लक्ष्मी विहीन हो गए. माँ लक्ष्मी के जाने से पूरे संसार में हाहाकार मच गया. इसके पश्चात स्वर्ग के स्वामी इंद्र ने कठोर तपस्या की और विशेष विधि विधान से मां लक्ष्मी का पूजा अर्चना की. इंद्रदेव को देखकर बाकी देवताओं और ऋषि-मुनियों ने भी माता लक्ष्मी का विधि विधान के साथ पूजन की.अपने भक्तों की भक्ति को देखकर मां लक्ष्मी प्रसन्न हुई और फिर से उनके सामने प्रकट हुई. तभी से इस दिन को लक्ष्मी जयंती के रूप में मनाया जाता है.



होली | Holi on 04 Mar 2026

होली/ धुलेंडी का महत्व-

धुलेंडी होली के त्यौहार का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. होलिका दहन के अगले दिन धुलेंडी /होली का पर्व बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है.



चैत्र मास का महत्व on 13 Apr 2021

चैत्र मास का महत्व-

हिन्दू धर्म में चैत्र मास को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र मास को पहला महीना माना जाता है। ज्योतिष में बताया गया है की चैत्र मास का संबंध चित्रा नक्षत्र से होता है इसलिए इस मास का को चैत्र मास कहा जाता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से भारतीय नववर्ष का आरम्भ होता है। चैत्र मास में ही वसंत ऋतु का अंत होता है और ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत होती है। शास्त्रों में चैत्र के इस पवित्र मास का संबंध ज्योतिष शास्त्र से भी माना गया है। क्योंकि इस चैत्र मास के आरम्भ से ही प्रकृति में शुभता और नई उर्जा का आरम्भ होता है। इसके साथ ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही चैत्र नवरात्र की शुरुआत होती है। 



होली भाई दूज | Holi Bhai Dooj on 05 Mar 2026

 होली भ्रातृ द्वितीया का महत्व-

चैत्र कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि के दिन होली भ्रातृ द्वितीया का पर्व मनाया जाता है। हिंदू धर्म में हर साल दीपावली और होली के त्यौहार के 2 दिन के पश्चात भ्रातृ द्वितीया का पर्व मनाया जाता है। भ्रात द्वितीय का पर्व भाई और बहन के प्रेम को दर्शाता है। भ्रातृ द्वितीया तिथि पर भाई अपने घर में भोजन ग्रहण नहीं करते हैं। भाई अपनी बहन के घर जाकर उनके हाथों से बना भोजन प्रेम पूर्वक ग्रहण करते हैं। इस दिन सभी बहनें अपने भाइयों की पूजा करती है। और भाई अपनी बहनों को उपहार स्वरूप वस्त्र आभूषण इत्यादि देते हैं। यदि आपकी कोई सगी बहन नहीं है तो आप अपनी किसी भी बहन के हाथों भोजन ग्रहण कर सकते हैं।



पापमोचिनी एकादशी | Papmochini Ekadashi on 15 Mar 2026

 

पापमोचनी एकादशी का महत्व-

सनातन धर्म के अनुसार इस पुरे संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिसने जाने अनजाने कोई पाप ना किया हो. ईश्वरीय विधान के अनुसार मनुष्य द्वारा किये गए पापों की सजा से बचा जा सकता है, अगर कोई व्यक्ति विधि- विधान से पापमोचिनी एकादशी का पावन व्रत करता है तो उसे उसके द्वारा किये गए पाप कर्मो से मुक्ति मिलती है. पापों से मुक्ति प्रदान करने तथा मोक्ष प्रदान करने वाली पापमोचिनी एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है. हमारे धर्म शास्त्रों में एकादशी तिथि को भगवान् विष्णु का स्वरुप बताया गया है. एकादशी तिथि के दिन भगवान् विष्णु का पूजन करने से भगवान् विष्णु संतुष्ट होकर अपने भक्तों के सभी कष्टों को दूर करते हैं. शास्त्रों के अनुसार पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से बड़े-बड़े यज्ञों के सामान पुण्य मिलता है.

 


मधु कृष्ण त्रयोदशी on 09 Apr 2021

मधु कृष्ण त्रयोदशी का महत्व-

मधुकृष्णा, या मधु कृष्ण त्रयोदशी, फाल्गुन या फाल्गुन माह में चंद्रमा के भटकने के चरण के समय  मनाया जाने वाला एक बहुत ही शुभ दिन माना जाता है. मधु कृष्ण त्रयोदशी का पर्व फाल्गुन माह (फरवरी - मार्च) में कृष्ण पक्ष के 13 वें दिन मनाया जाता है. इस बार ये पर्व 22 मार्च को मनाया जायेगा. मधु कृष्ण त्रयोदशी का पर्व भगवान शिव को समर्पित है. कुछ भक्त दिन पर एक समय उपवास करते हैं. कुछ हिंदू भक्त मधु कृष्ण त्रयोदशी के दिन अपनी इच्छानुसार पूरा दिन व्रत करते हैं. मधु कृष्ण त्रयोदशी का पर्व प्रमुख रूप से कुछ हिंदू समुदायों द्वारा भारत के पश्चिमी भाग में मनाया जाता है. मधु कृष्ण त्रयोदशी के दिन को मासरूमी के दिन भी मनाया जाता है.




रंग तेरस | Rang Teras on 17 Mar 2026

रंग तेरस का महत्त्व 

रंग तेरस का त्यौहार मुख्य रूप से हिंदू त्योहारों में से एक माना जाता है. रंग तेरस का त्यौहार हिंदू चैत्र माह के कृष्ण पक्ष के दौरान 'त्रयोदशी' तिथि अर्थात 13 वें दिन मनाया जाता है. कई जगहों पर रंग तेरस के पर्व को 'रंग त्रयोदशी' के नाम से भी जाना जाता है. दूसरे क्षेत्रों में रंग तेरस का समय फाल्गुन माह के हिंदू महीने में कृष्ण पक्ष मेल खाता है, अर्थात ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार फरवरी-मार्च के महीने में रंग तेरस का त्यौहार बहुत ही धूम धाम के साथ मनाया जाता है. विशेष रूप से रंग पंचमी का पर्व उत्तर भारत में बहुत ही उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है. पूरे देश के अधिकांश भगवान कृष्ण मंदिरों में रंग पंचमी के उत्सव को बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता हैं. रंग तेरस के त्यौहार को उन मंदिरों  में अधिक धूमधाम और विस्तृत तरीको से मनाया जाता है जहां भगवान श्रीकृष्ण की पूजा 'श्रीनाथजी' के रूप में की जाती है



भौमवती अमावस्या on 11 May 2021

भौमवती अमावस्या का महत्व 

अमावस्या तिथि हर मास में आती है. शास्त्रों में बताया गया है की चन्द्रमा के दो पक्ष होते है, पहला कृ्ष्ण पक्ष और दूसरा शुक्ल पक्षकृ्ष्ण पक्ष खत्म होने पर अमावस्या और शुक्ल पक्ष के खत्म होने पर पूर्णिमा आती है. पूर्णिमा को पर्व तिथि माना जाता है. पूर्णिमा के दिन व्रत, स्नान, दान, जप, होम और पितरों के नाम से भोजन, वस्त्र आदि का दान देना बहुत ही उतम माना जाता है. ज्येष्ठ माह में पड़ने वाली अमावस्या तिथि का महत्व दूसरे माह में पड़ने वाली अमावस्याओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना गया है. शास्त्रों के अनुसार से ज्येष्ठ मास की अमावस्या के दिन प्रात:काल जागकर नित्यक्रियाओं से निवृत होने के पश्चात् संकल्प करके पूजा करनी चाहिए



गुड़ी पड़वा | Gudi Padva on 19 Mar 2026

गुड़ी पर्व का महत्त्व-

गुड़ी पर्व का त्यौहार चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा के दिन मनाया जाता हैं. इसी दिन से हिन्दू नव वर्ष की शुरुआत होती है. गुड़ी का अर्थ होता है विजय पताका. मान्यताओं के अनुसार इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की थी. गुड़ी पर्व के दिन से ही नए संवत्सर की शुरुआत होती है. इसलिए गुड़ी पर्व को 'नवसंवत्सर' भी कहा जाता हैं. इसी दिन से चैत्र नवरात्रि की भी शुरुआत होती है. चैत्र माह में  वृक्ष तथा लताएं फलते-फूलते हैं. शुक्ल प्रतिपदा तिथि को चंद्रमा की कला का पहला दिन माना जाता है. चन्द्रमा जीवन के मुख्य आधार वनस्पतियों को सोमरस प्रदान करता है. चन्द्रमा को औषधियों और वनस्पतियों का राजा माना जाता है है. इसीलिए गुड़ी पर्व के दिन को वर्ष का आरम्भ माना जाता है.



चेटीचंड | Chetichand on 20 Mar 2026

जानिए क्या है चेटीचंड पर्व का महत्व

पुरे भारत देश में अलग अलग धर्म, समुदाय और जातियों के लोग रहते है हमारे देश को अनेकता में एकता का प्रतीक माना जाता हैं. यह हमारे लिए बहुत ही गर्व की बात है कि हमारे देश में सभी धर्मों के त्योहारों को बहुत ही धूमधाम और प्रमुखता के साथ मनाया जाता है, फिर चाहे वो दिवाली का त्यौहार हो, ईद हो, क्रिसमस या फिर भगवान झूलेलाल की जयंती हो….सिंधी समुदाय में भगवान् झूलेलाल के जनमोत्स्व का त्यौहार बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है. इस त्यौहार हो चेटीचंड के रूप में पूरे देश में बहुत ही उत्साह और हर्षोल्लास से मनाया जाता है.


गौरी तृतीया | Gauri Tritiya on 21 Mar 2026

गौरी तृतीया|

महत्व|

हिन्दू धर्म के अनुसार विवाह, वर व् वधु दोनों के लिए एक दूसरे जन्म के सामान है| विवाह के पश्चात दोनों के ही परिवार के प्रति व् एक दूसरे के प्रति जिम्मेदारियां बढ़ जातीं हैं| विवाह के बाद वर वधु दोनों ही एकदूसरे के साथ अपना पूरा जीवन व्यतीत करने की प्रतिज्ञा करते हैं| हर वैवाहिक जोड़ा यही चाहता है की विवाह के पश्चात उनका जीवन सुखद हो| अग्नि के सात फेरे लेकर वर व् वधु तन मन तथा आत्मा से एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं|


कभी कभी ऐसा होता है की व्यक्ति के तमाम प्रयासों के बाद भी या तो विवाह हो नहीं पता है या विवाह में विलम्भ होता है या विवाह होने के बाद विवाह में लगातार उतार चढ़ाव आता रहता है| इन्ही सब समस्याओं को दूर करने के लिए मनुष्य बहुत से तमाम तरह के उपाय, टोटके आदि करता है, परन्तु एक बहुत ही साधारण व् सरल उपाय करना नहीं जनता| देवों के देव महादेव व् माँ गौरी की उपासना, शुक्ल पक्ष की तृतीया को|


गौरी तृतीया का व्रत चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि जिसे गणगौर के नाम से भी जाना जाता है| गौरी तृतीया का व्रत चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया यानि गणगौर से प्रारम्भ करना सबसे उत्तम होता है, अन्यथा आप इसे किसी भी शुक्ल पक्ष की तृतीया से प्रारम्भ कर सकतें हैं| गौरी तृतीया का व्रत एक मात्र ऐसा व्रत है, जिसको नियम अनुसार करने से शीघ्र विवाह व् सुखद वैवाहिक जीवन का वरदान प्राप्त होता है



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