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जानिए क्या है विजया एकादशी की महिमा on 19 Feb 2020 (Wednesday)

जानिए क्या है विजया एकादशी की महिमा और पूजा विधि

 

फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष एकादशी के दिन विजया एकादशी का व्रत किया जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान राम ने लंका पर विजय पाने के लिए समुद्र के किनारे बैठकर भगवान  की पूजा की थी. विजया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. विजया एकादशी के दिन श्रद्धा पूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी कार्यों में सफलता मिलती है और सभी प्रकार के दोषों का नाश हो जाता है. विजय एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को मनचाहा वरदान मिलता है. भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी के पत्तों का इस्तेमाल जरूर करें.  


विजया एकादशी पूजा विधि-


1- विजया एकादशी व्रत करने के लिए दशमी तिथि को कलश स्थापना करें. आप सोने, चांदी, तांबे या मिट्टी के कलश की स्थापना कर सकते हैं

 

2- कलश में जल  के साथ-साथ अक्षत सुपारी और पंच पल्लव रखें. अब इसके ऊपर एक बर्तन में अक्षत भरकर भगवान विष्णु की स्थापना करें

 

3- अब एकादशी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें. स्नान करने के बाद माला, चंदन, सुपारी, नारियल, गंध और नैवेद्य से कलश की पूजा करें

 

4- पूरा दिन कलश के सामने बैठकर भगवान का ध्यान करें. भगवान के सामने घी का दीपक जलाएं, पूरा दिन व्रत करने के बाद अगले दिन द्वादशी को सूर्योदय होने पर उस कलश को किसी नदी या तालाब के तट पर स्थापित कर दें और षोडशोपचार से कलश की पूजा करें

 

5- अब देव प्रतिमा को किसी ब्राह्मण को दान में दे

 

6- श्रीराम ने  इसी विधि से विजया एकादशी का व्रत किया और व्रत के प्रभाव से उन्होंने रावण को हराकर लंका पर विजय प्राप्त की और माता सीता को उनकी कैद से आजाद कराया. इस व्रत को करने से मनुष्य के जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और मृत्यु के पश्चात उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है.


विजया एकादशी व्रत कथा

धर्मराजयुधिष्‍ठिर बोले - हेजनार्दन! फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की एकादशी काक्या नाम है तथाउसकी विधि क्या है?कृपा करके आप मुझेबताइए।


श्री भगवान बोले हे राजन्- फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की एकादशी कानाम विजया एकादशी है। इसके व्रतके प्रभाव से मनुष्‍यको विजय प्राप्त‍ होतीहै। यह सब व्रतोंसे उत्तम व्रत है। इसविजया एकादशी के महात्म्य केश्रवण व पठन सेसमस्त पाप नाश कोप्राप्त हो जाते हैं।एक समय देवर्षि नारदजीने जगत् पिता ब्रह्माजीसे कहा महाराज! आपमुझसे फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की एकादशी विधानकहिए।
ब्रह्माजी कहने लगे किहे नारद! विजया एकादशी का व्रत पुरानेतथा नए पापों कोनाश करने वाला है।इस विजया एकादशी की विधि मैंनेआज तक किसी सेभी नहीं कही। यहसमस्त मनुष्यों को विजय प्रदानकरती है। त्रेता युगमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्रजी कोजब चौदह वर्ष कावनवास हो गया, तबवे श्री लक्ष्मण तथासीताजी ‍सहित पंचवटी मेंनिवास करने लगे। वहाँपर दुष्ट रावण ने जबसीताजी का हरण ‍कियातब इस समाचार सेश्री रामचंद्रजी तथा लक्ष्मण अत्यंतव्याकुल हुए और सीताजीकी खोज में चलदिए।
घूमते-घूमते जब वे मरणासन्नजटायु के पास पहुँचेतो जटायु उन्हें सीताजी का वृत्तांत सुनाकरस्वर्गलोक चला गया। कुछआगे जाकर उनकी सुग्रीवसे मित्रता हुई और बालीका वध किया। हनुमानजीने लंका में जाकरसीताजी का पता लगायाऔर उनसे श्री रामचंद्रजीऔर सुग्रीव की‍ मित्रता कावर्णन किया। वहाँ से लौटकरहनुमानजी ने भगवान रामके पास आकर सबसमाचार कहे।
श्री रामचंद्रजी ने वानर सेनासहित सुग्रीव की सम्पत्ति सेलंका को प्रस्थान किया।जब श्री रामचंद्रजी समुद्रसे किनारे पहुँचे तब उन्होंने मगरमच्छआदि से युक्त उसअगाध समुद्र को देखकर लक्ष्मणजीसे कहा कि इससमुद्र को हम किसप्रकार से पार करेंगे।

श्रीलक्ष्मण ने कहा हेपुराण पुरुषोत्तम, आप आदिपुरुष हैं,सब कुछ जानते हैं।यहाँ से आधा योजनदूर पर कुमारी द्वीपमें वकदालभ्य नाम के मुनिरहते हैं। उन्होंने अनेकब्रह्मा देखे हैं, आपउनके पास जाकर इसकाउपाय पूछिए। लक्ष्मणजी के इस प्रकारके वचन सुनकर श्रीरामचंद्रजी वकदालभ्य ऋषि के पासगए और उनको प्रमाणकरके बैठ गए।
मुनि ने भी उनकोमनुष्य रूप धारण किएहुए पुराण पुरुषोत्तम समझकर उनसे पूछा किहे राम! आपका आनाकैसे हुआ? रामचंद्रजी कहनेलगे कि हे ऋषे!मैं अपनी सेना ‍सहितयहाँ आया हूँ औरराक्षसों को जीतने केलिए लंका जा रहाहूँ। आप कृपा करकेसमुद्र पार करने काकोई उपाय बतलाइए। मैंइसी कारण आपके पासआया हूँ।

वकदालभ्य ऋषि बोले किहे राम! फाल्गुन मासके कृष्ण पक्ष की एकादशीका उत्तम व्रत करने सेनिश्चय ही आपकी विजयहोगी, साथ ही आपसमुद्र भी अवश्य पारकर लेंगे।
इस व्रत की विधियह है कि दशमीके दिन स्वर्ण, चाँदी,ताँबा या मिट्‍टीका एक घड़ा बनाएँ।उस घड़े को जलसे भरकर तथा पाँचपल्लव रख वेदिका परस्थापित करें। उस घड़े केनीचे सतनजा और ऊपर जौरखें। उस पर श्रीनारायणभगवान की स्वर्ण कीमूर्ति स्थापित करें। एका‍दशी केदिन स्नानादि से निवृत्त होकरधूप, दीप, नैवेद्य, नारियलआदि से भगवान कीपूजा करें।
तत्पश्चात घड़े के सामनेबैठकर दिन व्यतीत करें‍और रात्रि को भी उसीप्रकार बैठे रहकर जागरणकरें। द्वादशी के दिन नित्यनियम से निवृत्त होकरउस घड़े को ब्राह्मणको दे दें। हेराम! यदि तुम भीइस व्रत को सेनापतियोंसहित करोगे तो तुम्हारी विजयअवश्य होगी। श्री रामचंद्रजी नेऋषि के कथनानुसार इसव्रत को किया औरइसके प्रभाव से दैत्यों परविजय पाई।
अत: हे राजन्! जोकोई मनुष्य विधिपूर्वक इस व्रत कोकरेगा, दोनों लोकों में उसकी अवश्यविजय होगी। श्री ब्रह्माजी नेनारदजी से कहा थाकि हे पुत्र! जोकोई इस व्रत केमहात्म्य को पढ़ता यासुनता है, उसको वाजपेययज्ञ का फल प्राप्तहोता है।