पंचम महाविद्या माँ छिन्मस्ता | Maa Chhinmasta on 23 Jan 2026
गुप्त नवरात्रि में पांचवें दिन माँ छिन्मस्ता की पूजा की जाती है।
देवी को समर्पित मंदिरों में तंत्र के रूप में महाविद्या की पूजा की जाती है। देवी छिन्नमस्ता के मंदिर और सार्वजनिक पूजा सामान्य रूप से नहीं की जाती है। जब गूढ़ तांत्रिक परंपरा की बात आती है तो छिन्नमस्ता को एक महत्वपूर्ण देवी के रूप में देखा जाता है। देवी के मंदिर भारतीय राज्यों ओडिशा, के पूर्वी भाग के साथ-साथ नेपाल में भी देखे जाते हैं। हिंदू धर्म के देवी-केंद्रित संप्रदाय, शक्तिवाद के कलिकुला संप्रदाय में देवी की पूजा की जाती है। साधारण उपासकों द्वारा इसी वजह से इसे आम जनता के लिए उपयुक्त नहीं माना गया है, लेकिन इनकी अलग से पूजा करने का विशेष विधान दिया गया है।
गुप्त नवरात्रि पांचवे दिन की जाती है माँ छिन्न्मस्ता की पूजा
गुप्त नवरात्रि के पांचवे दिन मां छिन्मस्ता की पूजा करने का नियम है. तंत्र शास्त्र में देवी छिन्मस्ता की उपासना से समाज में प्रसिद्धि मिलती है । पूर्वी भारत जैसे पश्चिम बंगाल, झारखंड और उत्तर प्रदेश और नेपाल में इनकी विशेष रूप से पूजा की जाती है। छिन्नमस्ता की पूजा में यदि कोई कमी की जाती है तो वह विपरीत फल देने वाली भी होती है। यही कारण है की आम लोगो के लिए इनकी साधना को उपयुक्त नहीं माना गया है। देवी छिन्नमस्ता की पूजा करने से मनुष्य को समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है और साथ ही सुख और समृद्धि का वरदान मिलता है. माँ छिन्नमस्ता की पूजा करने से मंसूही न केवल अपनी यौन ऊर्जा को नियंत्रित कर सकते हैं बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा को भी बढ़ा सकते हैं. देवी अपने साधक को ज्ञान, समृद्धि, विजय, स्वास्थ्य और धन का आशीर्वाद देती हैं. छिन्नमस्तिका पूजा उन लोगों के लिए बहुत प्रभावी है जो बांझपन, यौन रोग और ऋण से संबंधित समस्याओं का सामना कर रहे हैं. माँ छिन्नमस्ता की पूजा व्यावसायिक हानि से उबरने में भी मदद करती है.
माँ छिन्मस्ता की पूजा का महत्व -
माँ छिन्नमस्ता की पूजा से समृद्धि, स्थिरता और लंबे जीवन के साथ साथ और भी अनगिनत लाभ होते है. छिन्नमस्तिका मंत्र कुंडलिनी जागरण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. कुंडलिनी योग माँ के अभ्यास के दौरान मूला धरा चक्र के जागरण के लिए छिन्नमस्तिका मंत्र का जाप किया जाता है.
माता छिन्नमस्तिका मंत्र
श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीये हूं हूं फट् स्वाहा।
माता की उत्पत्ति कथा
माता छिन्नमस्तिका के बारे में एक पौराणिक कथा प्रसिद्द है. कथा के अनुसार एक बार माँ मंदाकिनी नदी में स्नान कर रही थीं. उस समय उनके साथ उनके दो सहयोगी अजय और विजया भी थी, स्नान करते समय माँ के सहयोगियों को भूख महसूस होने लगी. उन्होंने माँ से कुछ खाने के लिए माँगा. तब माँ ने उन्हें प्रतीक्षा करने के लिए कहा, पर अजया और विजया को बहुत ज़ोरो से भूख लगी थी इसलिए वो बार बार माँ से खाने के लिए कुछ मांगते रहे. सहायकों ने देवी से कहा की माँ तो वो होती है जो अपने बच्चों को भोजन उपलब्ध कराती है. अपने सहयोगीयो की बात सुनकर ’देवी भवानी ने अपना सिर काट दिया जो उनके बाएं हाथ में गिरा. उनके सिर से खून की तीन धाराएं निकलीं. इनमें से दो धाराओं को अजया और विजया ने भस्म का दिया. तीसरी धारा को देवी ने भस्म कर दिया. तब से, वह माता छिन्नमस्तिका के नाम से जानी जाने लगी. लेकिन, अजय और विजया को और रक्त चाहिए था तो देवी ने अपना माथा काट दिया और उन्हें अपना रक्त अर्पित किया. इसलिए, उन्हें माता छिन्नमस्तिका के नाम से जाना जाता है.